देहरादून के सिल्वर सिटी मॉल की सीढ़ियों पर शुक्रवार सुबह तड़तड़ाती गोलियों की आवाज गूंजी तो किसी ने नहीं सोचा था कि जमशेदपुर के कुख्यात गैंगस्टर विक्रम शर्मा की कहानी यहीं खत्म हो जाएगी। जिम से कसरत कर बाहर निकले विक्रम पर घात लगाए बैठे शूटरों ने बेहद करीब से फायरिंग की, तीन गोलियां चलीं और मौके पर ही उसका अंत हो गया। देहरादून पुलिस इसे गैंगवार और कारोबारी रंजिश के एंगल से परख रही है, जबकि झारखंड पुलिस उसकी पुरानी दुश्मनियों की फाइलें फिर से पलट रही है। इसी विक्रम शर्मा को, उसके शिष्य और झारखंड के डॉन अखिलेश सिंह के साथ, टाटा स्टील के रिटायर्ड सुरक्षा अधिकारी जयराम सिंह की हाई-प्रोफाइल हत्या के केस में अदालत ने 9 साल लंबी सुनवाई के बाद संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। गवाह पेश नहीं हो पाए, कड़ियां जुड़ नहीं सकीं और कोर्ट ने ‘दोष सिद्ध होने तक निर्दोष’ के सिद्धांत के तहत दोनों को रिहा कर दिया था। गुरु-शिष्य की थी दिमाग और ताकत की जोड़ी जमशेदपुर के अपराध जगत में विक्रम शर्मा को “दिमाग” और अखिलेश सिंह को “ताकत” माना जाता था। विक्रम शांत, मृदुभाषी और योजनाबाज; अखिलेश उग्र, फौलादी और बेखौफ एक्जिक्यूटर। जो सोच विक्रम के दिमाग में जन्म लेती, उसे ज़मीन पर उतारने का काम अखिलेश और उसके शूटर करते। पुलिस रिकॉर्ड और स्थानीय पुलिस अधिकारियों के मुताबिक, अखिलेश सिंह के खिलाफ अकेले जमशेदपुर के थानों में 50 से अधिक केस दर्ज रहे, जिनमें जेलर उमाशंकर पांडेय, टाटा स्टील अफसर जयराम सिंह, व्यापारी ओम प्रकाश काबरा, ट्रांसपोर्टर अशोक शर्मा, श्री लेदर्स के मालिक आशीष डे समेत कई हत्याएं और फायरिंग शामिल रही हैं। दूसरी ओर, विक्रम शर्मा के खिलाफ भी हत्या, फायरिंग, रंगदारी, जालसाजी और फर्जी दस्तावेज़ बनाने से जुड़े दर्जनों केस दर्ज हुए। पुलिस सूत्रों के मुताबिक, उस पर 50 से ज्यादा आपराधिक मामलों में नामजद होने के आरोप रहे हैं। एक समय ऐसा था जब जमशेदपुर की सड़कों पर ‘अखिलेश-विक्रम’ का नाम भर लेने से बड़े से बड़ा कारोबारी सहम जाता था। मार्शल आर्ट्स का उस्ताद विक्रम सिदगोड़ा के जंगल मैदान में बच्चों को ट्रेनिंग देता था। वहीं उसकी निगाह एक तेज-तर्रार युवक अखिलेश पर पड़ी, जो बाद में उसका सबसे बड़ा ‘शिष्य’ बना। गुरु ने शिष्य को चाइनीज़ मार्शल आर्ट्स फिल्मों से लेकर असल हथियारों की ट्रेनिंग तक सब सिखाया। परदे के पीछे से प्लान बनाने वाला विक्रम, और फ्रंट पर गोलियों की भाषा बोलने वाला अखिलेश, यहीं से इस जोड़ी की अपराधकथा शुरू हुई। सीरियल फायरिंग से डॉन की स्क्रिप्ट जेलर हत्याकांड के बाद विक्रम ने अखिलेश को शहर का नया डॉन प्रोजेक्ट करने की ठानी। उसके लिए जरूरत थी आतंक की एक ऐसी स्क्रिप्ट की, जिसे जमशेदपुर सालों तक याद रखे। 2007-2008 में सीरियल फायरिंग और हत्याओं की एक ऐसी कड़ी शुरू हुई, जिसने शहर को दहला दिया। 2 नवंबर 2007 को साकची आमबागान के पास श्री लेदर्स के मालिक आशीष डे की हत्या कर दी गई। कुछ ही महीनों में 15 मार्च 2008 को साकची में कारोबारी रवि चौरसिया पर फायरिंग, 20 मार्च को पूर्व जज आरपी रवि पर हमले की कोशिश, फिर 16 मई को आशीष डे के घर पर गोलियां। आम लोगों के बीच संदेश साफ था- जो भी आंख दिखाएगा, गोलियों से जवाब मिलेगा। इसके बाद 25 जुलाई को बिस्टुपुर में कांग्रेसी नेता नट्टू झा के दफ्तर पर गोलियां चलीं। 17 अगस्त 2008 को बर्मामाइंस में अपराधी परमजीत सिंह के ससुराल में फायरिंग, 28 अगस्त को साकची में ठेकेदार रंजीत सिंह पर हमला, 17 सितंबर को एमजीएम मोड़ पर बंदी परमजीत सिंह पर फायरिंग और आखिर में 4 अक्टूबर 2008 को टाटा स्टील के रिटायर सुरक्षा अधिकारी जयराम सिंह की हत्या। उसी साल कीनन स्टेडियम के पास ट्रांसपोर्टर अशोक शर्मा का भी मर्डर हुआ। शहर ने पहली बार महसूस किया कि यह महज अपराध नहीं, संगठित सत्ता प्रदर्शन है। इन्हीं दो हत्याओं( जयराम सिंह और अशोक शर्मा) ने अखिलेश-विक्रम जोड़ी को जमशेदपुर के अपराध इतिहास में स्थायी जगह दे दी। एक हत्या से टाटा स्टील के सीनियर ऑफिसर्स के बीच दहशत बैठी, तो दूसरी से ट्रांसपोर्टरों और होटल कारोबारियों को साफ संदेश मिला कि संपत्ति और पैसे की लड़ाई में कोई भी ‘अपना’ नहीं बचने वाला। अब विक्रम-अखिलेश की दो कहानियां पढ़िए… कहानी 1: बाग-ए-जमशेद की वह सुबह, जब जयराम नहीं लौटे 4 अक्टूबर 2008 की सुबह झारखंड में बिस्टुपुर के बाग-ए-जमशेद क्षेत्र में टाटा स्टील के रिटायर्ड सुरक्षा अधिकारी जयराम सिंह अपनी पोती के साथ जुबली पार्क से लौट रहे थे। स्कूल मोड़ के पास बाइक सवार हमलावरों ने नजदीक से गोली मार दी और फरार हो गए। गंभीर हालत में उन्हें टाटा मेन हॉस्पिटल ले जाया गया, जहां 24 घंटे बाद उनकी मौत हो गई। शहर में घटना को टाटा स्टील की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़े प्रमुख चेहरे पर हमला माना गया। जांच में अखिलेश सिंह और विक्रम शर्मा का नाम बेटे की शिकायत पर केस दर्ज हुआ। जांच में पुलिस ने रंगदारी और पुरानी रंजिश की कड़ियां जोड़ते हुए कुख्यात अपराधी अखिलेश सिंह और विक्रम शर्मा को साजिश का मास्टरमाइंड माना। गिरफ्तार शूटरों के बयानों में भी दोनों के नाम आए और चार्जशीट में उन्हें मुख्य आरोपी बनाया गया। मामला चर्चित ट्रायल में बदला। अभियोजन पक्ष ने 16 गवाह पेश किए। कुछ गवाहों ने हमलावरों को घटनास्थल के आसपास देखने की बात कही, जबकि फोरेंसिक रिपोर्ट ने कारतूस और अन्य सबूतों के आधार पर घटनाक्रम जोड़ने की कोशिश की। गवाह मुकरने से केस कमजोर पड़ा समय के साथ कुछ गवाह मुकर गए, कुछ अदालत में पेश नहीं हुए और कुछ ने बयान बदल दिए। बचाव पक्ष ने जांच पर सवाल उठाते हुए फंसाए जाने की दलील दी। लंबी सुनवाई के बाद अदालत ने कहा कि आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए और अखिलेश सिंह व विक्रम शर्मा को बरी कर दिया गया। अदालत ने कहा- बेगुनाह को सजा देने से बेहतर है कि दोषी छूट जाए। परिवार की न्याय की उम्मीद लगभग खत्म हो गई। शहर में जांच की कमजोरी और संगठित अपराध के प्रभाव को लेकर बहस छिड़ी। अभियोजन पक्ष ने अपील की बात कही, लेकिन आम धारणा यही रही कि बड़े नाम कानून की पकड़ से बच निकले।
कहानी 2: कीनन स्टेडियम के पास, अशोक शर्मा की विरासत पर चली गोलियां 1998 की एक शाम बिस्टुपुर में कीनन स्टेडियम के पास सड़क पर गोलियां चलीं और शहर के चर्चित ट्रांसपोर्टर व होटल कारोबारी अशोक शर्मा की हत्या कर दी गई। सोनारी आशियाना निवासी अशोक के पास करोड़ों की संपत्ति, साकची में बड़ा ट्रांसपोर्ट कारोबार और आवास क्षेत्र में होटल था। शुरुआती जांच में मामला संपत्ति और विरासत विवाद से जुड़ा पाया गया। पत्नी, सहयोगी और कारोबारी समेत कई नाम सामने आए जांच के दौरान अशोक की पत्नी पिंकी शर्मा, उनके करीबी सहयोगी विक्रम शर्मा, अखिलेश सिंह और व्यवसायी हरीश अरोड़ा सहित कई लोगों के नाम सामने आए। आरोप था कि करोड़ों की संपत्ति पर कब्जा करने की साजिश के तहत हत्या कराई गई। पुलिस जांच के साथ CID जांच भी हुई और चार्जशीट में अखिलेश सिंह व विक्रम शर्मा सहित कई आरोपियों को नामजद किया गया। ट्रायल के बाद अलग-अलग आरोपियों पर अलग फैसला लंबे ट्रायल के बाद अदालत ने आरोपियों की भूमिकाओं पर विचार किया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार हरीश अरोड़ा को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई, जबकि साक्ष्य के अभाव में अखिलेश सिंह, विक्रम शर्मा और कुछ अन्य आरोपी बरी कर दिए गए। इस फैसले के बाद उनके खिलाफ हत्या का मामला कानूनी रूप से समाप्त हो गया। हत्याकांड के बाद रिश्तों को लेकर विवाद अशोक शर्मा की मौत के बाद मामले ने नया मोड़ लिया। पुलिस के अनुसार, जिन पिंकी शर्मा पर हत्या की साजिश में शामिल होने का आरोप था, उनकी शादी बाद में विक्रम शर्मा के छोटे भाई अरविंद शर्मा से करा दी गई। अरविंद पर भी हत्याकांड से जुड़े आरोपों और काले धन को सफेद करने के मामले में रेड वारंट जारी हुआ, जबकि वह उत्तराखंड में कारोबार करते हुए फरार बताया गया। केस ने विक्रम की छवि पर असर डाला इस प्रकरण ने विक्रम शर्मा की उस छवि को और मजबूत किया, जिसमें रिश्तों, संपत्ति विवाद और कारोबारी हितों के बीच जटिल संबंधों की चर्चा होती रही। परिवार के भीतर हत्या, संपत्ति विवाद और बाद की वैवाहिक घटनाओं ने इस मामले को लंबे समय तक विवादों में बनाए रखा। नई जिंदगी और गोलियों में अंत जब जमशेदपुर में पुलिस ने अखिलेश–विक्रम गिरोह पर शिकंजा कसना शुरू किया, तब विक्रम शर्मा ने शहर छोड़ने का फैसला किया। इसके बाद करीब 10 साल तक वह पुलिस रिकॉर्ड में “मोस्ट वांटेड” बना रहा। इसी दौरान उसने उत्तराखंड के देहरादून को अपना ठिकाना बनाया। नए नाम, नए कागज और नई पहचान के साथ। बाद में जमशेदपुर पुलिस ने उसके एमजीएम थाना क्षेत्र स्थित आशियाना इंक्लेव फ्लैट पर छापेमारी की। यहां से तीन अलग-अलग पैन कार्ड, वोटर आईडी और ड्राइविंग लाइसेंस बरामद हुए। फोटो विक्रम का, नाम किसी और का। इन दस्तावेजों के आधार पर उस पर जालसाजी और फर्जी पहचान के नए मुकदमे दर्ज किए गए। करीब दस साल की फरारी का अंत 15 अप्रैल 2017 को हुआ। झारखंड पुलिस ने देहरादून पुलिस की मदद से राजधानी के एक किराए के फ्लैट से उसे गिरफ्तार कर लिया। यही शहर बाद में उसकी नई छवि की शुरुआत बना- जहां उसने खुद को कारोबारी, समाजसेवी और धार्मिक आयोजनों से जुड़ा व्यक्ति बताना शुरू किया। नई पहचान भी नहीं बचा सकी जान जमानत पर बाहर आने के बाद विक्रम ने सार्वजनिक जीवन में अपनी छवि बदल दी। सत्संग, समाज सेवा, प्रॉपर्टी डीलिंग और स्टोन क्रशर का कारोबार- देहरादून में वह ऐसा शख्स दिखने लगा जिसने अतीत पीछे छोड़ दिया हो। लेकिन फरवरी 2026 की एक सुबह उसी शहर ने उसका अंत भी देखा। रोज की तरह वह सिल्वर सिटी मॉल के जिम गया था। वर्कआउट के बाद जैसे ही एस्केलेटर पर कदम रखा, पहले से घात लगाए दो शूटरों ने नजदीक से फायरिंग कर दी। तीन गोलियां लगते ही वह वहीं गिर पड़ा। बाहर खड़ी बाइक पर तीसरा साथी दोनों हमलावरों को लेकर फरार हो गया। पुलिस के अनुसार, उसके पास लाइसेंसी पिस्टल थी, लेकिन हमले की तेजी ने उसे हथियार निकालने का मौका तक नहीं दिया। शुरुआती जांच में आपसी रंजिश और कारोबारी विवाद- दोनों एंगल पर जांच शुरू हुई और झारखंड पुलिस से भी संपर्क किया गया। गुरु की मौत-चेला अब भी सलाखों के पीछे गुरु की कहानी मौत पर खत्म हुई, लेकिन उसका शिष्य अखिलेश सिंह अभी भी जिंदा है। वो दुमका जेल में बंद है। बक्सर जिले के डुमरांव के एक पढ़े-लिखे परिवार से आने वाले अखिलेश के पिता पुलिस मेस एसोसिएशन से जुड़े रहे और बाद में राजनीति में सक्रिय हुए। शुरुआत ट्रांसपोर्ट कारोबार से हुई, लेकिन ट्रांसपोर्टर अशोक शर्मा की हत्या और व्यापारी ओम प्रकाश काबरा अपहरण मामले ने उसे अपराध की दुनिया में धकेल दिया। धीरे-धीरे वह अपराध जगत का बड़ा नाम बन गया। जमशेदपुर में उसके खिलाफ 50 से ज्यादा केस दर्ज बताए जाते हैं- जेलर उमाशंकर पांडेय हत्या, जयराम सिंह हत्याकांड, व्यापारियों पर फायरिंग, रंगदारी और पुलिस पर हमलों तक। 2006 में एक हत्या मामले में उसे उम्रकैद की सजा भी हुई, हालांकि कई मामलों में सबूतों के अभाव में वह बरी भी हुआ। 2017 में गुरुग्राम मुठभेड़ के बाद गिरफ्तारी और फिर घाघीडीह से दुमका जेल शिफ्ट, उसकी कहानी अदालतों और अपराध, दोनों के बीच चलती रही। सवाल जिनके जवाब अभी भी बाकी कई मामलों में बरी, कुछ में सजा, यह तस्वीर उलझी हुई है। अदालत के लिए हर आरोप संदेह से परे साबित होना जरूरी है, जबकि जमीन पर गवाहों के मुकरने और डर की चर्चा होती रही। विक्रम शर्मा की देहरादून में दिनदहाड़े हत्या ने इस बहस को और गहरा कर दिया। एक शहर में केस कमजोर पड़ते हैं, दूसरे शहर में पुरानी दुश्मनी नई गोलियों में लौट आती है। आज देहरादून पुलिस सीसीटीवी खंगाल रही है, झारखंड पुलिस पुरानी फाइलें देख रही है और अदालतों में तारीखें चल रही हैं। गुरु की कहानी खत्म हो चुकी है, शिष्य अभी जेल में है, लेकिन जमशेदपुर से देहरादून तक फैले सवाल अब भी जिंदा हैं।


