पहले हिंदी मीडियम से पढ़ाई, फिर अंग्रेजी मीडियम में आना चुनौती बन गया। पहले जईई एग्जाम में तीन परसेंटाइल आए तो हार मान ली, नौकरी की ठान ली लेकिन फिर से हिम्मत कर पढ़ाई शुरू की और इस बार जेईई में सफलता हासिल की। कहानी है बिहार के दरभंगा के रहने वाले शुभम कुमार की। शुभम दरभंगा के कोल्हंता पटोरी गांव का रहने वाला है जो कोटा में रहकर आईआईटी की तैयारी कर रहा है। एक समय जेईई मेन में महज 3 परसेंटाइल हासिल करने वाला यह छात्र अब 98.57 परसेंटाइल के साथ सफलता की नई कहानी लिख चुका है। शुभम एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखता है। पिता दरभंगा में प्राथमिक स्कूल में शिक्षक हैं, जबकि मां गृहिणी हैं। सीमित संसाधनों के बीच पले-बढ़े शुभम ने दसवीं कक्षा में 85 प्रतिशत अंक हासिल किए थे। परिवार में आईआईटी खड़गपुर से एमटेक कर चुकी बुआ की सफलता से प्रेरित होकर उसने भी आईआईटी में प्रवेश का सपना देखा। दसवीं तक हिंदी माध्यम में पढ़ाई करने के बाद अंग्रेजी माध्यम में आना शुभम के लिए चुनौतीपूर्ण साबित हुआ। कक्षा में पढ़ाए जाने वाले विषय समझना मुश्किल हो गया। धीरे-धीरे आत्मविश्वास कम होने लगा और उन्होंने कक्षाएं छोड़नी शुरू कर दीं। मानसिक दबाव इतना बढ़ा कि उसने कोटा छोड़ दिया और जयपुर में नौकरी की तलाश भी की, लेकिन जल्द ही उसे अहसास हुआ कि उसका लक्ष्य पढ़ाई ही है। पिछले साल तीन परर्सेंटाइल ही था स्कोर
जनवरी 2025 में जेईई मेन का परिणाम आया तो शुभम को मात्र 3 परसेंटाइल मिले। स्क्रीन पर दिख रहे अंक उनके लिए बड़ा झटका थे। माता-पिता की खामोश निराशा ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। यही वह क्षण था, जिसने उनके जीवन की दिशा बदल दी। हार मानने के बजाय शुभम ने दोबारा प्रयास करने का निर्णय लिया। परिवार की सहमति से वह फिर कोटा लौटा और कोचिंग में एडमिशन लेकर व्यवस्थित तैयारी शुरू की। इस बार उसने अपनी कमजोरियों पर विशेष ध्यान दिया। नियमित अभ्यास, पुराने प्रश्नपत्रों का विश्लेषण और अनुशासित दिनचर्या उनकी सफलता की आधारशिला बने। लगातार प्रयासों का परिणाम जेईई मेन 2026 में देखने को मिला, जब शुभम ने 98.57 परसेंटाइल हासिल किए। यह उपलब्धि न केवल उनके लिए, बल्कि उनके परिवार और क्षेत्र के लिए भी गर्व का विषय है। शुभम का कहना है कि असफलता से घबराने के बजाय उससे सीख लेनी चाहिए। सही दिशा में की गई मेहनत और आत्मविश्वास किसी भी परिस्थिति को बदल सकता है।


