16 अगस्त 2015 की दोपहर राजस्थान के भरतपुर जिले के चिकसाना के पीपला गांव की हवा में एक अजीब-सी बेचैनी थी। गांव का बस स्टैंड, जो आमतौर पर चाय की दुकानों की आवाजों, ट्रैक्टरों की गड़गड़ाहट और युवाओं की हंसी से भरा रहता था। उस दोपहर कुछ अलग महसूस कर रहा था। किसी के इंतजार में खड़ा था युवक
24 साल का राकेश वहां खड़ा था। उसने साधारण कपड़े पहन रखे थे, लेकिन आंखों में जैसे किसी अनदेखे तनाव की झलक थी। वह बार-बार सड़क की ओर देखता, फिर मोबाइल पर नजर डालता। कुछ लोग कहते हैं, वह किसी का इंतजार कर रहा था। कुछ कहते हैं, उसे पहले से अंदेशा था कि आज कुछ होने वाला है। दोपहर दो बजे 2 गाड़ियों में कुछ लोग आए
करीब दो बजे के आसपास धूल उड़ाती हुई दो गाड़ियां बस स्टैंड के पास आकर रुकीं। गाड़ियों से उतरे कुछ चेहरे गांव के लिए अनजाने नहीं थे। उनमें एक ऐसा नाम भी शामिल था, जिसका गांव की राजनीति और पंचायत में खास प्रभाव रहा था। गाड़ियों के रुकते ही माहौल बदल गया
गाड़ियों के रुकते ही माहौल अचानक बदल गया। वहां मौजूद लोगों की बातचीत धीमी पड़ गई। कुछ युवक थोड़ा पीछे हट गए। एक व्यक्ति तेज कदमों से राकेश की ओर बढ़ा। शब्द पूरी तरह किसी ने नहीं सुने, लेकिन आवाज का लहजा तल्ख था। कुछ ही सेकेंड में तीखी बहस शुरू हो गई। देखते ही देखते हाथापाई शुरू हुई
पहले धक्का लगा, फिर गाली-गलौज हुई, और देखते ही देखते हाथापाई शुरू हो गई। राकेश खुद को बचाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन सामने खड़े लोग ज्यादा थे। बस स्टैंड की भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी। महिलाएं बच्चों को खींचकर दूर ले गईं। कोई बीच-बचाव करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। युवक को चारों तरफ से घेर लिया था
गांव में पुरानी रंजिशों की कहानियां पहले से घूमती रहती थीं, इसलिए हर कोई जानता था कि यह साधारण झगड़ा नहीं है। कुछ ही मिनटों में राकेश चारों तरफ से घिर चुका था। उसके कपड़े फट गए, चेहरे पर खरोंचें आ गईं। तभी किसी ने जोर से चिल्लाया- अब बहुत हो गया। अगले ही पल गोली की आवाज गूंजी। राकेश पीछे की ओर गिरा। उसके सीने से खून बहने लगा। कुछ सेकेंड के लिए किसी को समझ नहीं आया कि क्या हुआ। फिर भगदड़ मच गई। दूर खड़े देखते रहे लोग
कुछ लोग गाड़ियों की तरफ भागे। कुछ दूर खड़े रहकर देखते रहे। दयाचंद जो राकेश का चाचा था, उसको किसी ने सूचना दी कि उसके भतीजे के साथ मारपीट हो रही है। सूचना मिलते ही दयाचंद सबसे पहले मौके पर पहुंचे और जमीन पर पड़े राकेश को उठाने की कोशिश करने लगे। उसकी आंखें खुली थीं, लेकिन उनमें जीवन की चमक नहीं थी। दयाचंद के हाथ-पांव डर से ठंडे पड़ चुके थे। दयाचंद को आभास हो गया था कि बड़ी अनहोनी हो गई है। दयाचंद राकेश को देखे जा रहा था और आसपास के लोग चिल्ला रहे थे। वारदात के बाद गांव वाले इकट्ठे हुए
बस स्टैंड की धूल में लाल रंग फैल चुका था। गांव के लोग धीरे-धीरे इकट्ठे होने लगे। किसी ने पुलिस को फोन किया। पुलिस पहुंची तो दोनों पक्षों के लोग अलग-अलग बयान देने लगे। एक तरफ आरोप था कि यह चुनावी रंजिश का नतीजा है, दूसरी तरफ दावा किया गया कि पहले हमला उधर से हुआ था और आत्मरक्षा में जवाब दिया गया। गांव में सन्नाटा पसरा था
गांव में उस रात सन्नाटा था। हर घर के अंदर एक ही चर्चा थी- गोली किसने चलाई? लेकिन उससे भी बड़ा सवाल था- क्यों? पंचायत चुनाव कुछ महीने पहले ही हुए थे। कहा जाता था कि उस चुनाव ने गांव को दो हिस्सों में बांट दिया था। आरोप-प्रत्यारोप, बैठकों में बहस, प्रतिष्ठा की लड़ाई, सब कुछ चल रहा था। लेकिन क्या सिर्फ राजनीति किसी की जान लेने की वजह बन सकती है? गांव में पुलिस बल तैनात किया गया
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में सामने आया कि गोली बेहद करीब से चलाई गई थी। यानी यह कोई भटकी हुई गोली नहीं थी। निशाना सीधा था। 15 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया। गांव में पुलिस बल तैनात कर दिया गया। दोनों पक्षों के बीच तनाव बढ़ गया। स्कूल कुछ दिनों तक बंद रहे। कोई खुलकर कुछ बोलने को तैयार नहीं था
गांव के बुजुर्ग कहते थे- ये दुश्मनी आज की नहीं है। कोई खुलकर यह नहीं बताता था कि असली दरार कहां से शुरू हुई थी। बस स्टैंड, जो कभी गांव की रौनक हुआ करता था, अब खामोश गवाह बन चुका था। उस जगह से गुजरते हुए लोग धीरे से कदम रखते, जैसे मिट्टी अब भी उस दिन की कहानी सुनाती हो। और सबसे बड़ा सवाल अब भी हवा में तैर रहा था- क्या यह सब अचानक हुआ या इसके पीछे कोई सुनियोजित साजिश थी? सच अभी भी परछाइयों में छिपा था। कल राजस्थान क्राइम फाइल्स, पार्ट–2 में पढ़िए आगे की कहानी…


