मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि झारखंड के आदिवासी-मूलवासी के हित व अधिकारों की रक्षा के लिए इनके विरोध में बने कायदे-कानून को टीक करने में लगा हूं। उन्होंने कहा कि राज्य के जल, जंगल, जमीन और सभ्यता-संस्कृति को संरक्षित करने के लिए हमारे पूर्वजों ने काफी संघर्ष किया है। समय-समय पर इस राज्य में कई नियम तथा कायदे-कानून बने। कुछ कायदे-कानून यहां के आदिवासी एवं मूलवासियों के हक में रहे, लेकिन कई चीजें विरोध में भी रहीं। जो कायदे-कानून विरोध में रहे, उसे ठीक करने के लिए भी हमारे पूर्वजों ने पुरजोर संघर्ष किया। मुख्यमंत्री शुक्रवार को कांके रोड स्थित अपने आवास पर राज्य भर से आए विभिन्न आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों को संबोधित कर रहे थे। सभी लोग झारखंड गठन के 25 साल बाद पेसा नियमावली को कैबिनेट से मंजूरी मिलने की खुशी जाहिर करने के लिए मुख्यमंत्री आवास पहुंचे थे। इस दौरान आदिवासी संगठन के प्रतिनिधियों द्वारा बजाए जा रहे ढोल-नगाड़े से पूरा परिसर गूंज रहा था। सभी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पेसा नियमावली को स्वीकृति देने पर बधाई दी। मौके पर केंद्रीय सरना समिति के केंद्रीय अध्यक्ष अजय तिर्की, रूपचंद केवट, मुन्ना मिंज, राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा के महासचिव जलेश्वर उरांव, बिरसा उरांव, सोमेश उरांव, सोमदेव उरांव सहित अन्य लोग शामिल रहे। राज्य के विकास में मील का पत्थर साबित होगी पेसा मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड में आदिकाल से निवास करने वाले जनजातीय समुदाय हमारी सभ्यता-संस्कृति की आत्मा हैं। उनके अधिकार, स्वाभिमान और स्वशासन को मजबूत करने वाला यह पेसा कानून आने वाले समय में समाज और राज्य के सर्वांगीण विकास में मील का पत्थर साबित होगा। राज्य सरकार ने गहन चिंतन और मंथन के बाद पेसा नियमावली को कैबिनेट से पास करने का काम किया है। पेसा को स्वीकृति एक साहसिक कदम : सभा मुंडा सभा ने पेसा नियमावली को स्वीकृति मिलने पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को बधाई दी। शुक्रवार को हुई बैठक में कैबिनेट के निर्णय को आदिवासियों के हक और अधिकार को बचाने की दिशा में साहसिक बताया गया। बैठक में बिलकन डांग, प्रभु सहाय संगा, डॉ. रोयल डांग, सुभाष कोन्गाड़ी, सोसन समद, पौलुस बुढ़ सहित अन्य थे।


