राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने अदालती आदेश के बावजूद मुकदमों को कॉज लिस्ट में शामिल नहीं करने को ‘न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप’ करार दिया है। जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने इस संबंध में दर्ज सुओ मोटो अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए रजिस्ट्री के अधिकारियों को भविष्य के लिए सतर्क रहने के निर्देश दिए हैं। हालांकि, मामले में अधिकारियों द्वारा पेश किए गए स्पष्टीकरण और बिना शर्त माफी को स्वीकार करते हुए खंडपीठ ने कॉज लिस्ट अधीक्षक व न्यायिक प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ शुरू सुओ मोटो अवमानना कार्यवाही समाप्त कर दी है। मामला 12 जमानत अर्जियों को कॉज लिस्ट में शामिल करने से जुड़ा था। वकीलों की परेशानी और कोर्ट की सख्ती यह पूरा विवाद 22 फरवरी 2024 को शुरू हुआ था, जब हाईकोर्ट की एकल पीठ ने प्रशासनिक लापरवाही उजागर की। 20 फरवरी को कोर्ट ने निर्देश दिया था कि विभिन्न जमानत याचिकाओं को 22 फरवरी के लिए कॉज लिस्ट में शामिल किया जाए। इसके बावजूद, सुबह 10:30 बजे ये मामले शामिल नहीं थे। एडवोकेट जेवीएस देवड़ा और डॉ. एपी सिंह ने अपनी शिकायत में बताया कि वादकारियों और वकीलों को अक्सर इस समस्या का सामना करना पड़ता है। वकील ने तर्क दिया कि दिल्ली जैसे दूरस्थ स्थानों से वकील इस उम्मीद के साथ जोधपुर में रुके थे कि सुनवाई होगी। वकील ने बताया कि यह स्थिति तब और खराब हो जाती है जब मामला जमानत अर्जियों से जुड़ा हो। कई मामलों में केस डायरी लेकर अधिकारी भी पहुंच गए थे, लेकिन लिस्ट न होने से असुविधा हुई। एकल पीठ ने इसे अधिकारियों की लापरवाही माना। 12 जमानत अर्जियों को किया गया था नजरअंदाज कोर्ट के आदेश के बावजूद जिन महत्वपूर्ण मामलों को समय पर कार्यसूची में जगह नहीं मिल पाई, उनमें मुख्य रूप से आपराधिक जमानत याचिकाएं शामिल थीं। इनमें भूपेंद्र बनाम राजस्थान राज्य, महेश बनाम राजस्थान राज्य, ललित बनाम राजस्थान राज्य और विशना राम बनाम राजस्थान राज्य जैसी अहम अर्जियां शामिल थीं। इसके अलावा कालू राम, वरिंगाराम, रतनलाल, रवि कुमार, ललित कुमार, राधाराम उर्फ राधाकिशन, बीरमाराम उर्फ ब्रह्मराम और बजरंग सिंह की जमानत अर्जियां भी उसी दिन सुनवाई के लिए नियत की गई थीं। इन सभी मामलों को सूची से बाहर रखा गया था। न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप पर अवमानना नोटिस एकल पीठ ने मामले की जड़ तक जाने के लिए कोर्ट मास्टर से जवाब तलब किया। कोर्ट मास्टर ने बताया कि 20 फरवरी को आदेशित सभी 12 फाइलों को 21 फरवरी की सुबह ही संबंधित क्लर्क को भेज दिया गया था। इसके बावजूद लिस्टिंग न होना एक बड़ी प्रशासनिक चूक थी। कोर्ट ने अपने आदेश में लिखा, “अदालत द्वारा अगली तारीख तय करने के बाद भी फाइलों को लिस्ट न करना न्याय के प्रशासन में हस्तक्षेप के समान है।” अदालत ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए कॉज लिस्ट अनुभाग के अधीक्षक अक्षय शर्मा और आपराधिक अनुभाग के न्यायिक प्रशासनिक अधिकारी दीपक सिंह राठौड़ के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किए। न्याय मित्र ने दिया फैसले का संदर्भ, मिली राहत इस सुओ मोटो अवमानना मामले की विस्तृत सुनवाई खंडपीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान न्याय मित्र प्रतीक गट्टानी ने सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले ‘मनोज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ का संदर्भ दिया। न्याय मित्र ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने उक्त फैसले में स्पष्ट किया था कि केवल इस बात पर रजिस्ट्री के अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू नहीं की जा सकती कि कोई मामला अदालत द्वारा तय की गई तारीख पर लिस्ट नहीं हो पाया है। सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि कई बार तकनीकी और प्रशासनिक कठिनाइयों के कारण आदेश के बावजूद लिस्टिंग संभव नहीं हो पाती है और इसे अदालत की अवमानना नहीं माना जाना चाहिए। न्याय मित्र ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में अवमानना याचिका दायर करने को रजिस्ट्री को डराने-धमकाने का प्रयास मानते हुए इसकी कड़ी निंदा की थी। बिना शर्त माफी और कार्यवाही का निस्तारण जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र सिंह भाटी और जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने इस मामले में सभी पक्षों की दलीलों को विस्तार से सुना। प्रतिवादी अधिकारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश जोशी ने पक्ष रखा और बिना शर्त माफीनामा पेश किया। खंडपीठ ने मामले में रिकॉर्ड पर मौजूद सभी तथ्यों, स्पष्टीकरणों और अधिकारियों द्वारा पेश की गई बिना शर्त माफी पर विचार किया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्थापित कानूनी नजीर और तमाम परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया। कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों की ओर से कोई भी कृत्य जानबूझकर आदेश की अवहेलना करने के इरादे से नहीं किया गया था। अंततः अदालत ने दोनों अधिकारियों को अवमानना के आरोपों से मुक्त करते हुए याचिका का निस्तारण कर दिया।


