बच्चा अगर आवाज पर किसी तरह का रिस्पॉन्स नहीं करता, आवाज आने वाली जगह की तरफ मुड़ नहीं रहा, देरी से बोल रहा है या साफ नहीं बोल रहा तो यह लक्षण हो सकते हैं बच्चे की सुनने की कम क्षमता के। हालांकि समस्या पैदा होने के दौरान से होती है। लेकिन कई बार ब्रेन फीवर, पीलिया इत्यादि से प्रभावित होने पर इलाज में होने वाली देरी के कारण भी सुनने की क्षमता खत्म हो सकती है। ऐसे में समय पर जांच, इलाज बहुत जरूरी है। रिपोर्ट्स के अनुसार पहले जहां 1000 में से एक बच्चे में सुनने की क्षमता न होने का पता चलता था। वहीं, अब ये 1000 में से 4 बच्चों में समस्या देखने को मिल रही है जिन्हें इंप्लांट की जरुरत है। इन बच्चों को या तो बिल्कुल नहीं सुनाई देता या बहुत कम सुनाई देता है। एक्सपर्ट्स के अनुसार जिन बच्चों में सुनने की क्षमता नहीं होती उनके लिए कॉकलियर इंप्लांट किया जाता है। इसी की जागरुकता के लिए 25 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय कॉकलियर इंप्लांट डे मनाया जाता है। कॉकलियर इंप्लांट डे आज : महंगे इलाज, जागरुकता की कमी से 90% बच्चों को इलाज नहीं मिल पाता लक्षणों की पहचान, इलाज में देरी और जागरुकता के अभाव के चलते कई बार पैरेंट्स द्वारा जांच में देरी हो जाती है। ऐसे में बच्चे जिंदगी भर सुनने में सक्षम नहीं हो पाते हैं। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों के अनुसार विश्व भर में 36 मिलियन बच्चे सुन पाने में असमर्थ हैं। जिन्हें रिहेबिलिटेशन की जरुरत है। इनके आने वाले समय में दोगुने होने की संभावना है। नेशनल मेडिकल जरनल ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न स्टडी के आंकलन में यह सामने आया कि देश में एक हजार की आबादी के पीछे 8 बच्चे न सुन पाने या बहुत कम सुन पाते हैं। लेकिन इलाज की बात की जाए तो महंगे इलाज, जानकारी और जागरुकता की कमी के कारण 90 फीसदी बच्चों को इलाज नहीं मिल पाता। ये हो सकते हैं लक्षण: {ऊंची आवाज पर रिस्पॉन्स न देना {किसी जोर की आवाज पर आंखें न झपकाना {एकदम होने वाले शोर पर उठ नहीं पाते {नई आवाज में दिलचस्पी नहीं दिखाते {जिस दिशा से आवाज आ रही है उस तरफ अपना सिर या आंखें नहीं करते {छोटे-छोटे शब्द जैसे मम्मी, बाबा, दादा इत्यादि नहीं बोल पाते {शब्दों को कॉपी नहीं कर रहे


