बड़वानी जिले की अंजड़ तहसील के ग्राम मंडवाड़ा के किसान बाबूलाल काग ने प्राकृतिक खेती और इंटरक्रॉपिंग का उपयोग कर कृषि लागत को कम किया है। वे क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए प्रेरणा बन गए हैं। किसान पहले रासायनिक खेती करते थे। हालांकि उपज अच्छी होती थी, लेकिन रसायनों और उर्वरकों पर होने वाला खर्च उनकी शुद्ध आय घटा देता था। उद्यानिकी एवं कृषि विभाग से प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उन्होंने प्राकृतिक खेती की पद्धतियों को अपनाया। गोवंश के अपशिष्ट से तैयार खाद से कर रहे खेती किसान के पास वर्तमान में 50 से 55 गोवंश हैं। वे खेती के लिए खाद के मामले में पूरी तरह गोवंश के अपशिष्ट पर निर्भर हैं। गोबर, मूत्र और बायोगैस की स्लरी को एक बड़े टैंक में इकट्ठा किया जाता है। इस खाद को खेत तक पहुंचाने के लिए उन्होंने सेंसर युक्त मड पंप का उपयोग किया है, जिससे पूरे खेत में प्राकृतिक खाद का समान रूप से छिड़काव सुनिश्चित होता है। इंटरक्रॉपिंग से करते हैं बहुफसली खेती किसान केवल एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय इंटरक्रॉपिंग का उपयोग कर रहे हैं। वे गेहूं, केला, आम, हल्दी, पपीता और तरबूज के साथ-साथ विभिन्न सब्जियों की खेती भी करते हैं। उन्होंने आम की केसरी और तोता परी जैसी विशेष किस्मों को भी अपने इंटरक्रॉपिंग मॉडल में शामिल किया है। किसान बोले-प्राकृतिक खेती से लागत कम लगता किसान बाबूलाल काग के अनुसार, ‘प्राकृतिक खेती न केवल हमारी मिट्टी को जीवित रखती है, बल्कि यह किसान को बाजार के महंगे खाद-बीज के कर्ज से भी मुक्त करती है।’ यह पद्धति किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में सहायक है। बाबूलाल काग की यह सफलता दर्शाती है कि आधुनिक तकनीक और प्राकृतिक खेती के सही मेल से कृषि को कम लागत में अधिक लाभदायक बनाया जा सकता है।


