इंदौर में बदला मिर्गी का पैटर्न:ब्रेन में गठान के केस घटे, स्ट्रोक से जुड़े दौरे बढ़े

इंटरनेशनल एपिलेप्सी डे के अवसर पर इंदौर के सरकारी अस्पतालों से सामने आए आंकड़े बताते हैं कि मिर्गी रोग के कारणों और मरीजों के पैटर्न में बीते कुछ वर्षों में बड़ा बदलाव आया है। पहले जहां दिमाग में गांठ यानी न्यूरोसिस्टीसरकोसिस के मरीज बड़ी संख्या में सामने आते थे, अब ऐसे मामलों में कमी देखी जा रही है। इसके उलट बुजुर्गों में ब्रेन ट्यूमर, स्ट्रोक और ब्रेन हेमरेज से जुड़े एपिलेप्सी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। युवाओं में अब भी एपिलेप्सी के मामलों में सिर की चोट, सड़क दुर्घटना और नशे से जुड़े कारण प्रमुख बने हुए हैं। एमवाय अस्पताल की ओपीडी में हर सप्ताह एपिलेप्सी के 15 से 20 मरीज पहुंच रहे हैं। इस आधार पर हर महीने करीब 100 से 150 मरीज उपचार के लिए आ रहे हैं। केस 1 – आलीराजपुर निवासी 60 वर्षीय महिला को लगातार दौरे पड़ने के कारण अस्पताल में भर्ती किया गया। सीटी स्कैन और एमआरआई जांच में मस्तिष्क में बड़ा ब्रेन ट्यूमर पाया गया। ट्यूमर का ऑपरेशन किए जाने के बाद महिला के दौरे पूरी तरह बंद हो गए। अब धीरे-धीरे दवाइयों की मात्रा कम की जा रही है। केस 2 – देवास निवासी 15 वर्षीय बालक को अचानक दौरे पड़ने लगे। जांच में सामने आया कि कान से मवाद निकलने के कारण मस्तिष्क में भी मवाद की गठान बन गई थी। ऑपरेशन के बाद बच्चे के दौरे लगभग समाप्त हो चुके हैं। 5 जरूरी बातें मिर्गी कोई पागलपन या मानसिक बीमारी नहीं, बल्कि मस्तिष्क से जुड़ा न्यूरोलॉजिकल रोग है।
अधिकतर मरीजों में नियमित और सही दवाइयों से दौरे नियंत्रित हो जाते हैं।
बिना डॉक्टर की सलाह दवा बंद करना या मात्रा बदलना बीमारी को गंभीर बना सकता है।
बार-बार दौरे आने पर जांच जरूरी है, क्योंकि कारण ट्यूमर, स्ट्रोक या पुरानी चोट भी हो सकती है।
जिन मामलों में दवाइयां असर नहीं करतीं, वहां सर्जरी भी प्रभावी विकल्प है। भास्कर एक्सपर्ट – – डॉ. अर्चना वर्मा, न्यूरोलॉजिस्ट, एमवायएच
– डॉ. राकेश गुप्ता, न्यूरोसर्जन, पूर्व विभागाध्यक्ष एमजीएम सिर में चोट, एक्सीडेंट, नशे की लत भी एपिलेप्सी के कारण युवाओं में एपिलेप्सी आमतौर पर जीवन के दूसरे और तीसरे दशक में पहली बार सामने आती है। सिर में चोट, गिरना, एक्सीडेंट, नशे की लत और नशा छोड़ने के दौरान होने वाला विड्रॉल भी एपिलेप्सी का बड़ा कारण बन रहा है। वहीं बुजुर्ग मरीजों में स्ट्रोक के बाद या ट्यूमर के कारण झटके आने के मामले बढ़े हैं। मिर्गी रोग का इलाज मुख्य रूप से दवाइयों से किया जाता है। अधिकांश मरीजों में नियमित और सही मात्रा में दवा लेने से दौरे नियंत्रित हो जाते हैं। यदि उचित इलाज के बावजूद दौरे लगातार बने रहते हैं, तो ऐसे मामलों में एपिलेप्सी सर्जरी की जरूरत होती है। पहले यह सर्जरी देश में बहुत कम स्थानों पर होती थी, लेकिन अब यह सुविधा कई बड़े चिकित्सा केंद्रों में उपलब्ध है। सिर की गंभीर चोट, कुछ प्रकार के ब्रेन हेमरेज या मस्तिष्क में खून जमा होने के बाद भी एपिलेप्सी के दौरे पड़ सकते हैं। ऐसे मामलों में दवाइयों के साथ ऑपरेशन से भी मरीज को राहत मिलती है। मिर्गी का इलाज लंबा चलता है, इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह दवाइयों में बदलाव या इलाज बंद करना नुकसानदायक हो सकता है। भ्रम और डर इलाज में बन रहे बाधा
विशेषज्ञों के अनुसार मिर्गी को लेकर समाज में आज भी कई गलत धारणाएं हैं। झटके आने पर कई लोग इलाज के बजाय झाड़-फूंक या घरेलू उपायों पर भरोसा करते हैं, जिससे बीमारी बढ़ जाती है। सामाजिक डर के कारण कुछ मरीज इलाज छिपाते हैं, जबकि समय पर जांच, नियमित दवा और फॉलोअप से मिर्गी के मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं। पढ़ाई और नौकरी कर सकते हैं।

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