आपने ड्रग्स तस्करी, सोना-चांदी या हथियारों की तस्करी के बारे में खूब सुना होगा, लेकिन क्या कभी ‘डीएनए तस्करी’ के बारे में सुना? एकेडमिक रिसर्च की आड़ में ये तस्करी हो रही है। भास्कर खुलासा कर रहा है- राजस्थान के आदिवासियों का ‘जेनेटिक कोड’ अमेरिका की बड़ी फार्मा कंपनियों के पास पहुंच गया है, प्रिसिजन-टारगेटेड मेडिसिन बनाने की तैयारी है। इसकी भनक न तो सरकार को है ना ही उन आदिवासियों को जिनके ब्लड सैंपल लिए गए। इनमें सहरिया, भील, मीणा, गरासिया, डामोर और कथौड़ी जनजाति शामिल हैं। बता दें, 2011 की जनगणना के अनुसार ये 6 जनजाति राजस्थान में आदिवासियों की कुल आबादी का 96.18% हैं। ‘सेरो-जेनेटिक प्रोफाइल एंड फायलोजेनेटिक रिलेशनशिप्स ऑफ ट्राइब्स ऑफ राजस्थान’ नाम के रिसर्च के लिए सतीश कुमार व डॉ. एमके भसीन ने सिर्फ दिल्ली यूनिवर्सिटी की एथिक्स कमेटी से अनुमति ली, केंद्र से इसकी मंजूरी नहीं ली। इस रिसर्च में उदयपुर जिले से भील व कथौड़ी, सिरोही जिले से गरासिया, डूंगरपुर जिले से डामोर, सवाई माधोपुर जिले से मीना और बारां जिले से सहरिया जनजाति के 647 लोगों के ब्लड सैंपल लिए। रिसर्च के नतीजों में सभी 6 जनजातियों के ‘बायोलॉजिकल ब्लूप्रिंट’ हैं, क्योंकि सैंपल किसी घर या गांव से नहीं, बल्कि रैंडम आधार पर लिए गए। इसमें हर आयु के स्त्री–पुरुष शामिल थे। चौंकाने वाली बात- रिसर्च के लिए केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने फंड दिया, लेकिन इसके डाटा का उपयोग अमेरिकी फार्मा कंपनियां कर रही हैं, वो भी बिना खर्च। एकसाथ इतनी जनजातियों का जेनेटिक कोड फार्मा कंपनियों के पास पहुंचने का यह पहला मामला है। सबूत; ओपन एक्सेस से अमेरिका तक पहुंचा बायोलॉजिकल ब्लूप्रिंट दिल्ली यूनिवर्सिटी के सतीश कुमार और डॉ. एमके भसीन ने रिसर्च किया, जो ‘एंथ्रोपोलॉजिस्ट’ जर्नल में प्रकाशित हुआ। इसका प्रकाशक भारतीय है, लेकिन जर्नल ‘ओपन एक्सेस’ है। यहां से ये पेपर रिसर्चगेट और गूगल स्कॉलर जैसे ओपन प्लेटफॉर्म्स पर सार्वजनिक हुआ। ये अमेरिका के सरकारी पोर्टल जैनबैंक पर ‘एक्सेशन नंबर’ के साथ दर्ज है। इसका सीधा एक्सेस फाइजर और मोडेर्ना जैसी फार्मा कंपनियों के पास है। इतना ही नहीं, इसे यूरोप और जापान के डाटा सेंटर्स में भी साझा किया जा रहा है। इस पेपर को डिजिटल ऑब्जेक्ट आइडेंटिफायर (DOI) नंबर भी मिला हुआ है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि अगर मूल वेबसाइट या लिंक डिलीट भी हो जाए, तो भी इसे खोला जा सकता है। आदिवासियों के ‘शुद्ध’ जीन की दुनिया के दवा बाजार में सबसे ज्यादा डिमांड जनजातियां सदियों से अपने ही समुदाय में शादी करती आई हैं। वैज्ञानिक इसे ‘इन-ब्रीडिंग’ कहते हैं। इससे उनका ‘जीन पूल’ शुद्ध रहता है। इनमें बीमारियां या इम्युनिटी स्पष्ट दिखती है। फार्मा कंपनियों के लिए यह एक ‘कंट्रोल ग्रुप’ की तरह काम करता है, जिससे वे दवाओं का सटीक असर जान सकती हैं। इनके म्यूटेशन के अध्ययन से ‘टारगेटेड दवाएं’ बनती हैं। संयोग या प्रयोग…? रिसर्चर अब अमेरिका की यूनिवर्सिटी में एसो. प्रोफेसर ये सतीश कुमार हैं। इन्होंने ही 6 जनजातियों पर रिसर्च किया। ये अब अमेरिका की टेक्सास रियो ग्रांडे वैली यूनिवर्सिटी में एसो. प्रोफेसर हैं। टेक्सास रियो ग्रांडे वैली यूनिवर्सिटी फाइजर और मोडेर्ना जैसी फार्मा कंपनियों के साथ जेनेटिक रिसर्च व ड्रग ट्रायल प्रोजेक्ट्स पर काम करती है। सतीश कुमार ने क्या राजस्थान के आदिवासियों पर रिसर्च इनके बायोलॉजिकल ब्लूप्रिंट को फार्मा कंपनियों तक पहुंचाने के लिए ही किया? भास्कर ने सतीश कुमार को 19 फरवरी को ई-मेल किया, उन्होंने जवाब नहीं दिया है। साथी रिसर्चर डॉ. एमके भसीन की मृत्यु हो चुकी है। रिसर्च का डेटा दवा बनाने का कच्चा माल, बिना अनुमति कंपनियों तक पहुंच गया भास्कर एक्सपर्ट- विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील यह गंभीर अपराध, निजता के अधिकार का भी हनन
जनजातीय लोगों को विशेष संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। गुमराह करके लिए गए डाटा का व्यवसायिक इस्तेमाल आईपीसी और बीएनएस के तहत गंभीर अपराध है। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के पुट्टूस्वामी फैसले में अनुचछेद-21 के तहत निजता को मौलिक अधिकार माना था। आईटी कानून की धारा-43-ए और 66-ई के अनुसार संवेदनशील निजी जानकारी को सार्वजनिक करने पर 3 साल की सजा, 2 लाख के जुर्माना के साथ हर्जाना भी देना पड़ सकता है। यहां तक कि कैदियों के अनिवार्य बायोलॉजिकल सैंपल लेने के लिए बनाये गये 2022 के क्रिमिनल प्रोसिजर आइडेंटीफिकेशन कानून के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय ने नोटिस जारी किया है।


