लुधियाना के किला रायपुर के रहने वाले कौर सिंह को एक गलत टीके ने बचपन में उनसे चलने की शक्ति छीन ली लेकिन आज वही कौर सिंह हजारों लोगों के लिए बैसाखी नहीं बल्कि ताकत बन चुके हैं। बचपन में हुआ हादसा: एक टीके ने बदल दी दुनिया 14 अगस्त 1983 को जन्मे कौर सिंह का जीवन सामान्य था लेकिन जब वह महज एक साल के थे तब बुखार के दौरान लगे एक गलत टीके ने उन्हें दिव्यांग बना दिया। पिता फौज में थे (15 साल देश की सेवा के बाद रिटायर हुए) और मां हाउसवाइफ। घर में अनुशासन और देशभक्ति का माहौल था लेकिन शारीरिक स्थिति बाधा बन रही थी। शूटिंग में काफी माहिर कौर सिंह ने अपनी शुरुआती पढ़ाई किला रायपुर में की और फिर नारंगवाल कॉलेज से 12वीं (नॉन-मेडिकल) की पढ़ाई पूरी की। साल 2000 में उनके जीवन में बड़ा मोड़ आया। एक कैंप के दौरान उन्होंने शूटिंग के कोच को देखा। खून में फौजी जज्बा था इसलिए बंदूकों और निशानों से लगाव होना लाजमी था। शूटिंग में वहाँ कई मेडल अपने नाम कर चुके हैं वहीं से उनके भीतर कुछ बड़ा करने की लौ जगी। 6000 दिव्यांगों को दिलाया हक,लगवाए 100 से ज्यादा कैंप आज कौर सिंह किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वह चेयरमैन कौर सिंह के नाम से सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं और दिव्यांगों की आवाज बन चुके हैं। ALIMCO, ADIP और RVY जैसी सरकारी योजनाओं के जरिए अब तक 6000 से ज्यादा दिव्यांगों को सरकारी मदद दिलवा चुके हैं। उनका एकमात्र लक्ष्य है दिव्यांगों को समाज के समान स्तर पर लाकर खड़ा करना। युवाओं को कड़ा संदेश: गैंगस्टर नहीं, गनमैन बनो… पर देश के लिए कौर सिंह आज की पीढ़ी को एक बेबाक संदेश देते हैं। वह कहते हैं आजकल के लड़कों को गोली चलाने और हथियार उठाने का बड़ा शौक है। मैं उनसे कहना चाहता हूं कि अगर गोली चलानी ही है तो गलियों में चलाकर गैंगस्टर का टैग मत लो। दम है तो फौज में भर्ती हो बॉर्डर पर जाओ और देश के लिए गोली चलाओ। असली मर्दानगी देश की रक्षा में है दहशत फैलाने में नहीं। जिस शख्स ने खुद चुनौतियों का सामना किया आज वह समाज के लिए एक बड़ा सहारा बन चुका है। कौर सिंह की कहानी साबित करती है कि विकलांगता शरीर में होती है दिमाग में नहीं।


