उज्जैन में सिंहस्थ मेला क्षेत्र नगर विकास योजना 2028 पर सवाल उठ गए हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने आशंका जताई है कि अगर क्षिप्रा नदी के किनारे 2344 हेक्टेयर जमीन पर बड़े पैमाने पर निर्माण किया गया, तो नदी का प्राकृतिक तंत्र नष्ट हो सकता है। एनजीटी ने सरकार से एक माह में जवाब मांगा है। नदी को स्थायी नुकसान से बचाने के लिए एनजीटी ने 7 सदस्यीय विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। समिति को निर्देश दिए गए हैं कि वह नदी किनारे चल रहे और प्रस्तावित निर्माण कार्यों का मौके पर जाकर निरीक्षण करे और डेढ़ महीने में तथ्यात्मक रिपोर्ट पेश करें। यह आदेश जस्टिस श्योकुमार सिंह और एक्सपर्ट मेंबर सुधीर कुमार चतुर्वेदी की पीठ ने उज्जैन के भैरवगढ़ निवासी रमेश द्विवेदी की याचिका पर दिया। याचिकाकर्ता के वकील इनोस जॉर्ज कॉर्लो ने बताया कि क्षिप्रा नदी विंध्याचल रेंज की कोकरी टेकरी पहाड़ी से निकलती है। यह नदी 195 किलोमीटर लंबी है, जिसमें से 93 किलोमीटर उज्जैन जिले में बहती है। इसका जलग्रहण क्षेत्र करीब 5 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला है। नगर विकास योजना 2028 में क्षिप्रा के दोनों किनारों पर पक्के घाट, स्कूल, कॉलेज, अस्पताल, होटल और धार्मिक संस्थाओं के स्थायी आश्रम बनाने का प्रस्ताव है। याचिका में कहा गया है कि इन निर्माणों से निकलने वाले सीवेज के प्रबंधन की कोई ठोस योजना नहीं है। पक्का निर्माण नदी किनारे के भू-जल स्रोतों को बंद कर देगा और इससे नदी की हालत और खराब होगी। 2 बड़ी चिंताएं : बड़े निर्माण हो रहे, सीवेज क्षिप्रा में ही जाएगा 1 एनजीटी ने कहा- क्षिप्रा के किनारे कई निर्माण बिना पर्यावरण मंजूरी किए जा रहे हैं, जबकि नियमानुसार 5 हेक्टेयर या 20 हजार वर्गमीटर से बड़े निर्माण के लिए केंद्र से अनुमति जरूरी है। 2 याचिकाकर्ता ने बताया- सिंहस्थ में 4.5 करोड़ श्रद्धालु उज्जैन आएंगे। एक माह तक रोज 20-25 लाख लोग शहर में रहेंगे, जिससे 245 एमएलडी अतिरिक्त सीवेज निकलेगा। इसके निपटान की योजना नहीं है। आशंका है कि यह क्षिप्रा नदी में ही छोड़ा जाएगा।


