ओरण-गोचर बचाने की जंग में महिलाऐं भी उतरी:कलेक्ट्रेट के पास महापड़ाव, 20 लाख बीघा जमीन को रिकॉर्ड में दर्ज करने की हुंकार

जैसलमेर की अनमोल विरासत ‘ओरण और गोचर’ भूमि को सोलर कंपनियों के आवंटन से बचाने की जंग अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। मंगलवार को जिला मुख्यालय स्थित कलेक्ट्रेट से महज 100 मीटर दूर वीर आलाजी मंदिर परिसर में आयोजित महापड़ाव में हजारों ग्रामीणों, पशुपालकों और मातृशक्ति ने हुंकार भरी। इस आंदोलन का केंद्र बिंदु जिले की 20 लाख बीघा ओरण, गोचर भूमि और प्राचीन कुओं को सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज कराना है। इस दौरान ग्रामीण इलाकों से भारी संख्या में महिलाएं भी मौजूद रही। महिलाओं ने भाग लेकर ये बताए दिया कि ओरण, गोचर, प्राचीन कुएं की लड़ाई में वे भी शामिल है। संत समाज और जनप्रतिनिधियों का मिला साथ महापड़ाव में आध्यात्मिक और सामाजिक नेतृत्व का अनूठा संगम देखने को मिला। पोकरण विधायक महंत प्रताप पुरी और संत समाज की मौजूदगी ने इस लड़ाई को और मजबूती दी। जिले भर के विभिन्न गांवों से आए पर्यावरण प्रेमियों और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों ने एक स्वर में कहा कि जिसे सरकार ‘राजकीय बंजर’ मानकर कंपनियों को सौंप रही है, वह वास्तव में हजारों मवेशियों का चरागाह और प्राचीन जल स्रोतों का केंद्र है। इस मौके पर पोकरण विधायक महंत प्रताप पूरी ने सबको सरकार की तरफ से आश्वस्त भी किया कि सरकार इस मामले को लेकर काफी गंभीर है और बहुत जल्द ओरण की जमीनों को सरकारी रेकॉर्ड में ओरण के नाम से दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। कड़ा संदेश: “एक दिन बैठने से कुछ नहीं होगा, जयपुर तक साथ चलो” आंदोलन के दौरान तनोट से जयपुर तक की पदयात्रा का नेतृत्व कर रहे पर्यावरण प्रेमी भोपाल सिंह झालोड़ा ने अपने संबोधन में जमीनी हकीकत और संघर्ष की कठोरता को साझा किया। उन्होंने ग्रामीणों को एकजुट करते हुए सीधा और कड़ा संदेश दिया। भोपाल सिंह झालोड़ा का वर्जन: “यहाँ कलेक्ट्रेट के पास एक दिन बैठने से कुछ नहीं होने वाला। अगर वाकई अपनी 20 लाख बीघा जमीन को ओरण के रूप में रिकॉर्ड में दर्ज करवाना चाहते हो, तो हमारे साथ जयपुर तक पैदल चलो। आज हम मुट्ठी भर लोग हैं, लेकिन जब यह संख्या 50 से 500 और हजारों में तब्दील होगी, तभी सरकार की नींद टूटेगी और जमीन सुरक्षित होगी। बिना बड़े संघर्ष के कोई मतलब नहीं निकलने वाला।” महिलाओं और पशुपालकों की अभूतपूर्व भागीदारी ग्रामीण अंचलों से आए पशुपालकों के साथ-साथ महिलाओं की बड़ी संख्या इस प्रदर्शन की मुख्य ताकत रही। रामगढ़ तहसील मुख्यालय पर पिछले कई दिनों से जारी धरने की गूँज आज जिला मुख्यालय पर भी सुनाई दी। तनोट से शुरू हुई पदयात्रा के सूत्रधार सुमेरसिंह सांवता ने भी ओरण के पारिस्थितिकी और गोडावण संरक्षण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा- हमारी लड़ाई सरकार से है, किसी भी पार्टी से हमारा कोई लेना देना नहीं है, हमारा उद्देश्य केवल पर्यावरण को बचाना है, हमारी चारगाह और ओरण को बचाना है। प्रमुख मांगें और कलेक्ट्रेट कूच सभा के बाद हजारों का यह हुजूम पैदल मार्च करते हुए जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय पहुंचा। प्रदर्शनकारियों ने जिला कलेक्टर को मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपकर निम्नलिखित मांगें रखीं: सोलर कंपनियों को ओरण-गोचर भूमि पर दिए गए सभी आवंटन तत्काल रद्द किए जाएं। जिले की समस्त 20 लाख बीघा ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में ‘ओरण’ के रूप में ही दर्ज किया जाए। पारंपरिक जल स्रोतों और कुओं के आसपास के क्षेत्र को ‘संरक्षित क्षेत्र’ घोषित किया जाए। ये खबर भी पढ़ें। …. ओरण बचाने जैसलमेर से जयपुर आ रहा काफिला:रोज 30KM का सफर तय कर रहे, पूर्व विधायक के बेटे और वकील भी शामिल राजस्थान में ओरण भूमि को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज करवाने की मांग को लेकर ग्रामीणों का संघर्ष जारी है। ओरण को देवी-देवताओं की भूमि माना जाता है। इसके संरक्षण की जिम्मेदारी ग्रामीण संभालते हैं। जैसलमेर में ग्रामीणों के अनुसार- ओरण का अस्तित्व दिनोंदिन सिमट रहा है। इसके लिए जिले के युवाओं ने खड़ताल और ढोलक की थाप पर लोक-देवताओं के भजनों के साथ पैदल यात्रा निकालने का फैसला किया है। मंडी में शामिल लोगों को ‘टीम ओरण’ का योद्धा कहा जा रहा हैं। शामिल सदस्य तनोट माता के मंदिर से जयपुर तक करीब 725 किलोमीटर की पैदल यात्रा पर निकले हैं। (खबर पढ़ें) ओरण भूमि बचाने के लिए 725 किलोमीटर यात्रा:बोले-वादे फाइलों में दब गए, जयपुर पहुंचकर अनिश्चितकालीन धरना देंगे। …
जैसलमेर में ओरण भूमि को बचाने के लिए सड़कों है। 17,562 बीघा जमीन को रेवेन्यू रिकॉर्ड में दर्ज के लिए निकाली जा रही पदयात्रा शुक्रवार को रामगढ़ पहुंची। बोले-सरकार हमारे धैर्य की परीक्षा न लें। भारत बहुत बड़ा है, विकास करे, विनाश नहीं। अब भी अगर सरकार ने जल्द निर्णय नहीं लिया, तो जयपुर पहुंचकर अनिश्चितकालीन धरना दिया जाएगा। तनोट राय माता मंदिर से शुरू हुई पदयात्रा 725 किलोमीटर चलकर जयपुर पहुंचेगी। आंदोलनकारियों ने कहा-34 दिन धरने के बाद प्रशासन ने तीन महीने का समय मांगा था, लेकिन अब तक कोई कार्रवाई नहीं की। टीम ओरण के सुमेर सिंह सावंता ने बताया- वादे फाइलों में दब गए, तब हमें सड़क पर उतरना पड़ा। अब फैसला जयपुर में होने वाले ऐतिहासिक धरने में ही होगा।(खबर पढ़ें)

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