कबीर परंपरा और बाबा नागार्जुन का आभास कराने वाले अनूठे कवि विनोद शंकर भावुक नहीं रहे गुमनामी गरीबी और विपन्नता के साए में बिताया जीवन

कबीर परंपरा और बाबा नागार्जुन का आभास कराने वाले अनूठे कवि विनोद शंकर भावुक नहीं रहे
गुमनामी गरीबी और विपन्नता के साए में बिताया जीवन
(संतोष कुमार झा)
अनूपपुर।
श्यामला रंग मजबूत कद-काठी, अस्त-व्यस्त सफेद बाल और लम्बी दाढ़ी, खोजती ढूंढती सी आंखों वाले कबीर की परंपरा से और बाबा नागार्जुन का आभास कराने वाले अनूपपुर के नितांत मौलिक और अनूठे कवि विनोद शंकर भावुक नहीं रहे। वे अनूपपुर के वयोवृद्ध कवि थे। उनकी रचना धर्मिता में आध्यात्म और दर्शन बड़े सहज तरीके से सामने आता था। उन्होंने दोहे सहित विभिन्न छंदों में काव्य रचना की। उनकी आधा दर्जन से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हुई थीं। जिन्हें भावुक जी स्वयं अपने संसाधन से प्रकाशित कराते थे और फिर झोले में रखकर लागत भर की कीमत निकालने के लिए उसे पाठकों को बेचते थे। भावुक सच्चे कवियों के प्रति समाज और सरकारी कितने निष्ठुर और असंवेदनशील हो सकती हैं उसके एक उदाहरण थे। साहित्य अकादमी या इतनी पुस्तकें प्रशासन अनुदान के लिए स्वीकृत करती हैं उनमें से दो परसेंट किताबें भी भावुक जी के स्तर की नहीं होती। 50-50 हजार के पुरस्कार जुगाड़ू साहित्यकारों को मिल जाते हैं जिनका कोई एक अक्षर नहीं पढता। लेकिन भावुक जी जैसे साहित्यकार जिनका एक पाठक वर्ग था। जिनकी शब्द रचना पर पकड़ थी। जिनके पास लिखने के लिए नए विषय थे। शैली थी। वह कैसे और किस प्रकार गुमनामी में रहे आए यह समूचे समाज के लिए चिंतन का विषय होना चाहिए। विनोद शंकर भावुक ने तकरीबन 28 साल पहले नए साल के आगमन पर और पुराने साल के बीतने पर दो पंक्तियां कहीं थी-
क्या-क्या गुल खिलाया छियानवे का साल
अनगिनत मुकुटधारी हो गये कंगाल।

भावुक जी ने गरीबी और विपन्नता में अपना जीवन काटा उन्हें साहित्यकार होने के नाते किसी प्रकार की सरकारी सहायता मिली हो इसकी जानकारी नहीं मिलती। अंतिम समय में उन्होंने धार्मिक साहित्य भी रचा। लेकिन उनकी अपनी दृष्टि थी। कहने का सलीका था। उनकी आवाज में भी एक जिज्ञासा थी। अपने बड़े बेटे कनिष्क भावुक की उसमें मौत ने उन्हें काफी झकझोर कर रख दिया था। जो गणित विषय के बेहतरीन व्याख्याता थे। उन्होंने अपनी एक पुस्तक का प्रकाशन भी किया था जिसे उन्होंने अपने स्वर्गवासी बेटे को समर्पित किया था।
कबीर पंथ के अनुगामी  
शब्द उजाला अंधियारे में, देखो नैना खोल
साखी चलनी सत-असत में, चेतन भावुक झोल

विनोद शंकर भावुक विचारो से कबीरपंथी थे और कबीर में उनकी गहरी आस्था थी। समाज में फैली कुरीतियों और धार्मिक हठधर्मिता, पाखंड आदि के खिलाफ वे हमेशा मुखर रहें। उन्होंने कबीर दर्शन, भजन और पद, कबीर नियमावली, शोध पुराण और राम रस आदि की रचना की। इन्होने रामायण, वेद, कुरान का हिंदी संस्करण और बायबिल का अध्ययन किया था।
जीवन यात्रा
विनोद शंकर का जन्म 1 अप्रैल 1949 में हुआ। और 29 दिसंबर 2024 को 74 वर्ष की आयु में निधन हो गया। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा अनूपपुर में और हायर सेकेंडरी की शिक्षा शहडोल में पूरी की। इनके 3 पुत्र और 1 पुत्री है। जानकारी के अनुसार सन् 1980 तक जीवन यापन के लिए आंवला तेल और इत्र बनाकर बेचा करते थे। इनके द्वारा स्वनिर्मित तेल का नाम दरबार आंवला तेल और इत्र का नाम दरबार इत्र था। बाद में यह तेल अनूप आंवला तेल और अनूप इत्र के नाम से बेचा जाने लगा। 1980 के बाद यह काम बंद कर दिया था।
राजनैतिक सफर
अनूपपुर के इक्के-दुक्के लोग यह जानते होगे कि सन् 1990 में विनोद शंकर ने सोहागपुर विधानसभा से निर्दलीय प्रत्याषी के रूप में चुनाव भी लड़ा था। सोहागपुर विधानसभा में अपनी किस्मत आजमा रहे 27 प्रत्याषियों में इनका 20वां स्थान था। राजनैतिक विचार धारा से ये समाजवादी थे चैधरी चरण सिंह को ये अपना आदर्ष मानते थे। ये लोकदल के सदस्य भी रहे। हेमवतीनंदन बहुगुणा शरद यादव, चंद्रशेखर सिंह आदि नेताओं से भी इनका संपर्क था। क्षेत्र के सांसद दलवीर सिंह से इनका दोस्ताना संबंध रहा। विनोद शंकर भावुक से मिलकर ऐसा लगता था जैसे आप निष्ठुर समाज को दर्पण में देख रहे हों और वेदना से साक्षात्कार कर रहे हैं। भावुक जी का न रहना एक परंपरा का अंत है। एक ऐसी अपूरणीय क्षति है समाज की जिसका समाज को अंदाजा भी नहीं है।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *