करीब 22 साल बाद बीएसएफ के जवान को राहत:हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदला, कहा-अपराध के अनुपात में कठोर सजा दी

राजस्थान हाईकोर्ट ने बीएसएफ के जवान को राहत देते हुए उसके 22 साल पुराने बर्खास्तगी आदेश को अनिवार्य सेवानिवृत्ति में बदल दिया हैं।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की बेंच ने यह फैसला पवन प्रजापति और केंद्र सरकार द्वारा दायर अपील पर सुनवाई करते हुए दिया।

अदालत ने कहा कि जवान के अपराध के अनुपात में बर्खास्तगी जैसी कठोर सजा न्यायसंगत नहीं हैं।

ऐसे में पेंशन के लिए आवश्यक न्यूनतम सेवा अवधि तक जवान की सेवा काल्पनिक (नोशनल) रेगुलर मानी जाए। लेकिन उसे उस अवधि का वेतन या भत्ते नहीं मिलेंगे।

8 दिन की छुट्टी लेकर 77 दिन रहा अनुपस्थित
केंद्र सरकार की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता सुनील समदड़िया ने कहा कि पवन प्रजापति को 12 जनवरी 1995 को बीएसएफ में कॉन्स्टेबल (जनरल ड्यूटी) के पद पर नियुक्त किया गया था।

साल 2003 में उन्हें 27 अक्टूबर से 4 नवंबर तक आठ दिन की आकस्मिक छुट्टी स्वीकृत की गई थी और उन्हें 5 नवंबर 2003 को ड्यूटी पर वापस रिपोर्ट करना था।

हालांकि प्रजापति निर्धारित समय पर ड्यूटी पर वापस नहीं लौट सके। उन्होंने अपनी अनुपस्थिति का कारण अपनी मां की अचानक गंभीर हृदय बीमारी बताया।

वे लगभग 77 दिन बाद 20 जनवरी 2004 को स्वयं ड्यूटी पर लौटे।

इस बीच विभाग ने उनके खिलाफ अवकाश से अधिक समय तक अनुपस्थित रहने के आरोप में विभागीय कार्रवाई शुरू की। मामला संक्षिप्त सुरक्षा बल न्यायालय (SSFC) के समक्ष चला और 8 मार्च 2004 को उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

इसके खिलाफ प्रजापति ने विभागीय अपील दायर की, लेकिन 31 अगस्त 2004 को अपीलीय प्राधिकारी ने भी बर्खास्तगी को बरकरार रखा।

सिंगल बेंच ने पुन सेवा में लेने का दिया था आदेश
बर्खास्तगी के आदेश के खिलाफ प्रजापति ने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की। उन्होंने तर्क दिया कि विभागीय कार्रवाई में प्रक्रियात्मक अनियमितताएं थीं, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ और सजा अत्यधिक कठोर है।

19 जुलाई 2023 को एकलपीठ ने विभागीय आदेशों को रद्द करते हुए उन्हें सेवा में पुन स्थापित करने का निर्देश दिया।

हालांकि अदालत ने उन्हें बर्खास्तगी से पुनर्नियुक्ति तक की अवधि के लिए बकाया वेतन देने से इनकार कर दिया था। साथ ही मामला दोबारा विचार के लिए विभाग को भेज दिया गया था।

इस फैसले से दोनों पक्ष असंतुष्ट थे। प्रजापति ने बकाया वेतन की मांग और मामले को दोबारा विभाग को भेजने के खिलाफ अपील दायर की, जबकि केंद्र सरकार ने पुनर्नियुक्ति के आदेश को ही चुनौती दी।

मामला जानबूझकर सेवा छोड़ने का नहीं था
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि विभागीय जांच में प्रक्रियात्मक त्रुटियां नहीं थीं और प्रजापति को आरोपों का जवाब देने तथा गवाहों से जिरह करने का अवसर दिया गया था।

अदालत ने यह भी माना कि प्रजापति ने 77 दिनों तक बिना अनुमति के छुट्टी बढ़ाई थी, इसलिए उनके खिलाफ लगाए गए आरोप सिद्ध होते हैं।

हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि यह मामला जानबूझकर सेवा छोड़ देने का नहीं था, क्योंकि प्रजापति स्वयं वापस ड्यूटी पर लौट आए थे। साथ ही उस समय तक उनका सेवा रिकॉर्ड भी अच्छा था।

इन परिस्थितियों को देखते हुए सीधे बर्खास्तगी जैसी कठोर सजा अपराध के अनुपात में अत्यधिक है और न्यायसंगत नहीं है।

अदालत ने संबंधित विभाग को छह सप्ताह के भीतर आवश्यक आदेश जारी करने के निर्देश दिए।

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