करोड़ों का मंदिर लेकिन नहीं थी आग बुझाने की पर्याप्त व्यवस्था पीड़ित परिवार के आंसुओं से बुझती रही आग

करोड़ों का मंदिर लेकिन नहीं थी आग बुझाने की पर्याप्त व्यवस्था
पीड़ित परिवार के आंसुओं से बुझती रही आग
(आदित्य सिंह)
अनूपपुर।
अमरकंटक में 23 दिसंबर को जैन मंदिर के पास लगी त्रिपाली दुकानों में आग लग जाने से बहुत सी दुकान जलकर राख हो गई आज इतनी भीषण थी की आज पर तुरंत काबू नहीं पाया जा सका हालांकि दुकानदारों का यह आरोप है की नगर पालिका की फायर ब्रिगेड आग लगने की सूचना के घंटे बाद पहुंची जिले के वरिष्ठ अधिकारी ने भी फोन नहीं उठाया और हमारी दुकाने और दुकान में रखें खिलौने पूजन सामग्री या अन्य सभी वस्तुएं जलकर राख हो गई पीड़ित परिवारों ने प्रशासन पर भी जमकर गंभीर आरोप लगाया है हालांकि मौके पर जिले के कलेक्टर एसपी समेत तमाम अधिकारी घटनास्थल पर मौजूद रहे और आज किन कारणो से लगी है इसका पता लगाने की बात की जा रही।
कब हुआ मंदिर का निर्माण
अमरकंटक का जैन मंदिर इसे सर्वोदय जैन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। वर्तमान में मध्यप्रदेश के अनूपपुर जिले में स्थित यह मंदिर अपनी विशालता एवं वास्तुकला के लिए जाना जाता है। मंदिर का निर्माण कार्य 2006 में जैन धर्म के अनुयायियों एवं सेवकों के सार्थक प्रयास से प्रारंभ हुआ एवं 2023 में इसका उद्घाटन हुआ। यहां भगवान आदिनाथ की 24 टन वजनी अष्टधातु की प्रतिमा है जो 28 टन वजनी कमलाकर अष्टधातु आसन पर स्थापित हैं। प्राचीन काल से ही अमरकंटक तीर्थ स्थल का उल्लेख हिंदू एवं जैन ग्रंथों में मिलता है। यहां भगवान आदिनाथ की 1000 वर्ष प्राचीन प्रतिमा है। समय के कालानुक्रम में धर्म प्रचारकों ने यहां मंदिर का निर्माण भी कराया था। वर्तमान जैन मंदिर जहां आज स्थापित हैं वहीं नजदीक 12वी शताब्दी में जैन धर्म की प्राचीन मंदिर थी।जिसे 16वी शताब्दी में मुगल आक्रमणकारियों ने विध्वंश कर दिया था। पुनः धर्म सेवकों द्वारा इसे 19वीं शताब्दी में मंदिर का पुनरुद्धार कराया। विंध्य एवं सतपुडा पर्वतमाला की ग्रंथि में स्थित पवित्र नगरी अमरकंटक जैन और हिन्दू धर्म के लोगों के आस्था का केंद्र है। यह अपनी कला और जनजातीय जीवन के लिए विश्व और जनमानस में प्रख्यात है।
देश विदेश से आते है श्रद्धालु  
आश्चर्य है कि इस अनोखी एवं अनुपम कला की मिसाल विश्व प्रसिद्ध जैन मंदिर जिसे देश तो क्या विदेशों के पर्यटक हर समुदाय एवं सम्प्रदाय के लोग एवं श्रद्धालु दर्शन और भक्ति के लिए आते हैं, फिर इतने महत्वपूर्ण स्थान पर शासन, प्रशासन के साथ साथ जैनियों के प्रबंधन कर्ताओं से आपातकालीन परिस्थितियों से निपटने एवं सुरक्षा पर चूक कहां और कैसे हो गयी,….जो दुनिया में जैन सम्प्रदाय सदैव दीन दुखियों सेवा और चिंतन में सदैव रहा है, उससे आज अपने ही घर में लापरवाही एवं उदासीनता का आरोप क्यों झेलना पड़ रहा है,, …कहीं उसकी सुरक्षा में विफलता ही उसकी कमजोरी तो नहीं बन गई.. रही बात प्रशासन की तो निःसंदेह यह प्रशासन की की घोर लापरवाही का एक जीत जागता प्रत्यक्ष उदाहरण है ,और इतने महत्वपूर्ण स्थान पर एक भी अग्निशामक नहीं थे..और यदि थे तो उपलब्ध क्यों नहीं रहे।

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