करौली में रियासत काल से चला आ रहा ऐतिहासिक फाल्गुन मेला मेला दरवाजा स्थित मैदान में शुरू हो गया है। यह मेला होली से एक सप्ताह पूर्व शिवरात्रि पशु मेले के बाद शुरू होता है। मेला होली तक चलता है। मेले में करौली के साथ भरतपुर, जयपुर, भुसावर और अन्य राज्यों से व्यापारी आते हैं। यहां मसाले, लोहे और लकड़ी के सामान की दुकानें लगती हैं। स्थानीय लोग पूरे साल के लिए घरेलू सामान और मसाले खरीदते हैं। बदलते समय के साथ मेले का स्वरूप भी बदला है। अब यहां मनोरंजन के लिए झूला, नाव, रहटक और ट्रंपोलिंग जंप भी लगाए जाते हैं। महिलाएं सौंदर्य प्रसाधन और सजावटी सामान खरीदती हैं। दुकानदारों के अनुसार यह मेला क्षेत्र में काफी प्रसिद्ध है। कई दुकानदारों की दो से तीन पीढ़ियां लगातार इस मेले में व्यापार करती आ रही हैं। हालांकि, मेला स्थल पर बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण अब मेला सिमटने लगा है। बड़ी संख्या में बच्चे, बुजुर्ग, युवक और महिलाएं मेले का आनंद लेने पहुंच रहे हैं। मेला स्थानीय संस्कृति और परंपरा का प्रतीक बन गया है।


