राजस्थान क्राइम फाइल्स के पार्ट-1 में आपने पढ़ा भरतपुर के पीपला का 10 साल पुराना केस। दो पक्षों के विवाद में एक युवक की गोली मारकर हत्या कर दी गई। बस स्टैंड पर उस दोपहर घटे हत्याकांड का सच तुरंत सामने नहीं आया। शुरुआत में यह एक साधारण मारपीट का मामला लगा। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, पुलिस को एहसास हुआ कि यह हिंसा अचानक भड़का गुस्सा नहीं थी, बल्कि लंबे समय से सुलग रही दुश्मनी इसकी वजह थी। घटनास्थल से बरामद खोल, खून से सनी मिट्टी, टूटी चप्पलें और गवाहों की बिखरी हुई कहानियां, हर चीज किसी बड़े टकराव की तरफ इशारा कर रही थी। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट ने साफ किया कि गोली बेहद करीब से सीने में मारी गई थी। जांच जब गहराई तक पहुंची तो पुलिस को समझ आया- हत्याकांड की कहानी सड़क पर नहीं, पंचायत की बैठकों और चुनावी मंचों पर लिखी जा चुकी थी। ट्रिगर बस उस स्क्रिप्ट का अंतिम शब्द था। महीने भर पहले हुए पंचायत चुनाव ने पीपला गांव को दो हिस्सों में बांट दिया था। गांव की चौपाल पर हुई एक सार्वजनिक बैठक में तीखी बहस हुई थी। सार्वजनिक बैठक में पूर्व सरपंच सौदान सिंह और राकेश दोनों पक्षों के बीच तीखी नोकझोंक हुई थी। राकेश के परिवार के सदस्य ने सौदान सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ा और जीता था। आरोप है कि उस बैठक में खुलेआम चुनौती दी गई थी। वही चुनौती धीरे-धीरे व्यक्तिगत दुश्मनी में बदल गई। गांव के कुछ लोगों ने पुलिस को बताया कि कई बार रास्ता रोकने, ताना मारने और छोटी-मोटी झड़पों की घटनाएं हो चुकी थीं। घटना से एक रात पहले दोनों पक्षों के बीच फोन पर तीखी बहस हुई थी। कॉल डिटेल रिकॉर्ड ने यह पुष्टि की कि देर रात तक बातचीत चली। पुलिस को शक हुआ कि अगले दिन की मुलाकात अचानक तय नहीं हुई थी। कुछ गवाहों ने बयान दिया कि अगले दिन बात साफ कर देंगे जैसी धमकी दी गई थी। वारदात के प्रत्यक्षदर्शियों ने अदालत में बताया कि पूर्व सरपंच सौदान सिंह ने परिवार के लोगों के साथ मिलकर राकेश के साथ मारपीट शुरू कर दी। आरोपी पक्ष के लोग एक साथ गाड़ियों में आए थे। उनमें से एक व्यक्ति के पास लाइसेंसी पिस्टल थी। बहस के दौरान जब मारपीट बढ़ी तो सौदान सिंह ने हथियार निकाला और राकेश को गोली मार दी। अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि हथियार लेकर मौके पर पहुंचना इस बात का संकेत है कि मंशा पहले से बनी हुई थी। बचाव पक्ष ने कहा कि पिस्टल लाइसेंसी थी और आत्मरक्षा में निकाली गई। लेकिन सवाल यह था अगर आत्मरक्षा थी, तो गोली सीने में बेहद करीब से कैसे लगी? मुकदमे के दौरान कोर्ट में घटनास्थल का नक्शा पेश किया गया। बताया गया कि राकेश को चारों तरफ से घेर लिया गया था। मेडिकल रिपोर्ट में यह भी दर्ज था कि उसके शरीर पर मारपीट के कई निशान थे। यानी गोली चलने से पहले उसे बुरी तरह पीटा गया था। यह एकतरफा हमला था या सामूहिक भिड़ंत, इस पर लंबी बहस चली। दूसरे पक्ष ने भी उसी दिन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी, जिसमें 54 लोगों के नाम शामिल थे। जांच में पाया गया कि कई नाम ऐसे थे जो घटना के समय गांव में मौजूद ही नहीं थे। पुलिस ने इसे पलटवार की रणनीति बताया। कानूनी दबाव बनाने की कोशिश करार दिया गया था। आखिरकार जांच में 11 लोगों की भूमिका मारपीट में सामने आई और उनके खिलाफ चालान पेश किया गया। करीब एक दशक तक यह मामला अदालत में चला। गवाहों पर दबाव डालने की कोशिशों की भी चर्चा हुई। कुछ गवाह अपने बयान से मुकर गए, कुछ ने बयान बदल दिए। लेकिन कॉल रिकॉर्ड, फॉरेंसिक रिपोर्ट और प्रत्यक्षदर्शियों के शुरुआती बयान अभियोजन के पक्ष को मजबूत करते रहे। सुनवाई के दौरान तीन आरोपियों की मौत हो गई, लेकिन अदालत ने रिकॉर्ड के आधार पर उन्हें भी दोषी माना। जज ने लंबा फैसला पढ़ा। अदालत ने माना कि यह हमला पूर्व नियोजित था और गोली जान लेने की नीयत से चलाई गई। सुनवाई के दौरान भोजा, सौदान और राजू की मौत हो गई, लेकिन कोर्ट ने उन्हें भी दोषी माना। बचे हुए 12 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और 20-20 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया। दूसरी ओर, मारपीट और हिंसक झड़प में शामिल 11 लोगों को सात-सात साल की सजा और 10-10 हजार रुपए का जुर्माना लगाया गया। आखिर क्यों हत्या होते हुए देखती रही भीड़:रंजिश का चुनाव से कनेक्शन का दावा, खून से सनी लाश ने फैलाई दहशत, पार्ट-1


