इस गांव के अलावा किसी और गांव में कैंसर की प्रॉब्लम नहीं है। यहां ये स्थिति आम हो गई है। अब भी 22 साल का एक लड़का और 18 महीने की एक बच्ची कैंसर से पीड़ित है। बहुत से लोग तो बीमारी के बारे में बताते ही नहीं है। शाजापुर के अमलाय पत्थर गांव की कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर सुधा परमार आगे कहती हैं कि समस्या बहुत गंभीर है, लेकिन इसका कारण अभी तक पता नहीं चला है। यदि कैंसर की स्क्रीनिंग हो तो और मामले सामने आएंगे। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक शाजापुर जिले के इस गांव में पिछले 10 साल में 35 से ज्यादा लोगों की कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से मौत हो चुकी है। 2017 में जब गांव में एक साथ कैंसर के 11 पेशेंट मिले थे तो सरकार की तरफ से यहां की पानी और मिट्टी की जांच कराई गई थी, लेकिन ये पता नहीं चला कि गांव में कैंसर होने की वजह क्या है? गांव के लोगों का कहना है कि उनके गांव को किसी की नजर लग गई है। आखिर इस गांव में कैंसर की वजह से लोग कितनी परेशानियों से गुजर रहे हैं? ये जानने भास्कर की टीम गांव पहुंची। यहां ग्रामीणों के साथ-साथ एक्सपर्ट से भी बात की। वर्ल्ड कैंसर डे पर पढ़िए रिपोर्ट… ऐतिहासिक विरासत पर कैंसर का साया
शुजालपुर तहसील मुख्यालय से महज 10 किलोमीटर दूर बसा अमलाई पत्थर पहली नजर में किसी भी आम गांव की तरह ही दिखता है। लेकिन जैसे ही आप लोगों से बात करना शुरू करते हैं, गांव पर छाया मौत का सन्नाटा और गहराता जाता है। ग्रामीण गर्व से बताते हैं कि यह गांव रानी शकुंतला का मायका हुआ करता था और यहां की धरती महाभारत की गवाह रही है। गांव के पुराने मंदिर और चौक में रखी प्राचीन मूर्तियां इस दावे को बल भी देती हैं। लेकिन यह ऐतिहासिक गौरव अब फीका पड़ चुका है। गांव वाले कहते हैं, “सब कुछ था हमारे पास, लेकिन अब सिर्फ कैंसर का श्राप है। हमारी विरासत को नजर लग गई है। 35 लोगों की मौत हो चुकी
गांव में हमारी मुलाकात सबसे पहले ग्राम रोजगार सहायक रवि शर्मा से हुई, जो पिछले 13 सालों से यहां कार्यरत हैं। वह गांव की स्थिति पर आधिकारिक मुहर लगाते हुए कहते हैं, “अभी इस गांव की आबादी 1835 है और करीब 350 मकान हैं। हमारे सर्वे और आंकड़ों के अनुसार, साल 2000 से 2025 के बीच यहां कैंसर से 35 से 36 लोगों की मौत हो चुकी है। अभी भी 2-3 एक्टिव केस हैं, जिनका इलाज चल रहा है। रवि बताते हैं कि सबसे चिंता की बात यह है कि कैंसर का कोई ठोस कारण पता नहीं चल पाया है। आमतौर पर लोग सोचते हैं कि तंबाकू या शराब से कैंसर होता है यहां उन लोगों ने भी जान गंवाई है, जिन्होंने जीवन में कभी सुपारी तक नहीं चखी। शासन ने की जांच, लेकिन नतीजा ‘शून्य’
गांव के पूर्व सरपंच और वर्तमान सरपंच के पति राय सिंह राजपूत बताते हैं कि यह समस्या आज की नहीं, बल्कि दशकों पुरानी है। “हमारे गांव में यह बहुत लंबे समय से चल रहा है। हमने कई बार शासन-प्रशासन का दरवाजा खटखटाया। पानी और मिट्टी के सैंपल लिए गए, जांचें हुईं, लेकिन रिपोर्ट में कभी कुछ नहीं निकला। हर बार अधिकारी आते हैं, देखकर चले जाते हैं, लेकिन समाधान आज तक नहीं मिला।” कैंसर से मौत के दो दर्दनाक किस्से…. केस-1: 28 लाख खर्च, 2 बीघा जमीन बिकी, फिर भी नहीं बचा भाई
बातचीत के दौरान ही हमें चैन सिंह मिले, जो पेशे से पेंटर हैं। उनकी कहानी सुनकर किसी का भी दिल दहल जाएगा। उन्होंने 28 साल के अपने छोटे भाई अजय को कैंसर में खो दिया। भर्राई आवाज में चैन सिंह बताते हैं, “सब कुछ ठीक चल रहा था। अजय गांव में ही मोबाइल रिपेयरिंग की दुकान चलाता था। शादी हो चुकी थी, एक बेटा और एक बेटी है। अचानक एक दिन उसकी कमर में दर्द शुरू हुआ। शुरुआत में हमने इसे मामूली दर्द समझा और शुजालपुर में ही इलाज कराते रहे। जब दर्द असहनीय हो गया तो भोपाल के हमीदिया अस्पताल ले गए। वहां डॉक्टरों ने जांच के बाद बताया कि उसे कैंसर है। यह सुनते ही हमारे पैरों तले जमीन खिसक गई। इसके बाद अजय को बचाने के लिए परिवार की असली जंग शुरू हुई। भोपाल में ऑपरेशन हुआ, लेकिन हालत नहीं सुधरी। किसी की सलाह पर वे उसे अहमदाबाद ले गए, फिर वहां से मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल। तीन साल तक इलाज का सिलसिला चलता रहा। चैन सिंह बताते हैं, “मैं तीन साल तक उसे लेकर मुंबई के चक्कर काटता रहा। इलाज में करीब 28 लाख रुपए खर्च हो गए। टाटा मेमोरियल से 12-13 लाख की मदद मिली, आयुष्मान कार्ड से भी कुछ सहायता हुई। मैंने उन्हें कभी मीठी सुपारी खाते भी नहीं देखा था
हम चैन सिंह के साथ उनके घर पहुंचे। घर के एक कोने में उनके दिवंगत भाई अजय की तस्वीर लगी थी। अजय की पत्नी सुमति देवी से जब हमने बात की, तो उनका दर्द आंसुओं में छलक पड़ा। उन्होंने कहा, “मेरे पति को किसी तरह का कोई शौक नहीं था। तंबाकू-शराब तो बहुत दूर की बात है, मैंने उन्हें कभी मीठी सुपारी खाते हुए भी नहीं देखा था। हम आज तक यह समझ नहीं पाए कि उन्हें कैंसर क्यों और कैसे हुआ? मेरा तो पूरा परिवार ही उजड़ गया।” अपने दो छोटे बच्चों की ओर इशारा करते हुए वह कहती हैं, “एक बेटा सात साल का है और बेटी बारह की। अब इनका भविष्य खतरे में है। केस-2: पिता ने 25 साल पहले बहन को खोया, अब बेटे को कैंसर
इसी गांव के गजराज सिंह सिसोदिया की कहानी में दर्द भी है और उम्मीद की एक किरण भी। उनके 20 साल के बेटे अंकित को ब्लड कैंसर है। गजराज बताते हैं, शुरुआत में बेटे के पेट में दर्द होता था। स्थानीय डॉक्टरों से फायदा नहीं हुआ तो इंदौर ले गए, जहां जांच में ब्लड कैंसर का पता चला। हम उसे तुरंत अहमदाबाद ले गए। करीब एक साल इलाज चला। एक समय तो हालत इतनी गंभीर हो गई थी कि वह बिना सहारे के चल भी नहीं पाता था। डॉक्टरों ने कहा था कि स्थिति बहुत क्रिटिकल है। लेकिन आज अंकित की तबीयत बेहतर है। गजराज कहते हैं- डॉक्टरों का कहना है कि वह 99% रिकवर हो चुका है। भगवान ने हमारी सुन ली। गजराज का दर्द यहीं खत्म नहीं होता। वह बताते हैं- आज से 25 साल पहले मैंने अपनी 12 साल की बहन को भी कैंसर में खो दिया था। दस साल पहले हैंडपंप बंद, उसी जगह दूसरा चालू हो गया
गांव में एक छोटा सा क्लीनिक चलाने वाले डॉ. सैफुद्दीन का कहना है कि यह स्थिति सिर्फ अमलाय पत्थर गांव की है, आसपास के किसी और गांव में कैंसर के इतने मामले नहीं हैं। यहां कैंसर के मरीज हमेशा से रहे हैं, लेकिन युवा इसका ज्यादा शिकार हो रहे हैं। शुरुआती लक्षण बिल्कुल सामान्य होते हैं- पेट दर्द, सिर दर्द या कमर दर्द। कुछ ही समय में यह दर्द एक ट्यूमर में बदल जाता है और फिर मरीज को बचाना लगभग नामुमकिन हो जाता है। डॉ. सैफुद्दीन एक महत्वपूर्ण जानकारी देते हैं, 2017-18 में गांव में एक साथ 13 एक्टिव कैंसर पेशेंट थे, जिनमें से लगभग सभी की मौत हो चुकी है। जब एक साथ 13 मौतें हुईं तो प्रशासन जागा। घर-घर सर्वे हुआ, पानी और मिट्टी की जांच हुई, लेकिन कारण फिर भी नहीं मिला। गांव में एक हैंडपंप था, जिसे संदिग्ध मानकर बंद कर दिया गया था। लेकिन हैरानी की बात है कि अब उसी के कुछ मीटर की दूरी पर दूसरा हैंडपंप चल रहा है। मुझे इस समस्या के बारे में नहीं पता– सीएमएचओ
शाजापुर जिले की चीफ मेडिकल एंड हेल्थ ऑफिसर डॉ. कमला आर्या से जब हमने इस विषय पर बात की तो उनका कहना था कि वह इस गांव में कैंसर के विषय में अवगत नहीं है। उनका कहना है कि अगर ऐसी स्थिति है तो हम उस गांव में जाकर मेडिकल कैम्प लगाएंगे। सीएमएचओ अनुमान लगाने लगी कि हो सकता है कि गांव से होकर हाईटेंशन लाइन गुजर रही हो या फिर हो सकता है कि पानी में फ्लोराइड की वजह से दिक्कत हो सकती है। सरकारी अमले को नहीं पता एमपी में कितने कैंसर पेशेंट
मध्य प्रदेश में कैंसर की स्क्रीनिंग कैसे होती है और प्रदेश में कितने कैंसर के रोगी हैं? इनका जवाब जानने के लिए हमने मध्यप्रदेश की नेशनल हेल्थ मिशन की डायरेक्टर डॉ. सलोनी सिडाना ने बताया कि वह यह नहीं जानती हैं कि मध्यप्रदेश में कितने कैंसर के पेशेंट हैं। वह आगे कहती हैं कि कैंसर रजिस्ट्री से ही पता चलता है कि किस जिले में किस प्रकार के कितने कैंसर पेशेंट हैं। बड़ी बात यह है कि जिला अस्पतालों में कीमोथेरेपी सेंटर स्थापित किए गए हैं। लेकिन इन सेंटर्स में सिर्फ फोलोअप कीमोथेरेपी या डे केयर ही होती है। शुरूआती थेरेपी या जटिल परिस्थितियों में मेडिकल कॉलेज या दूसरे कैंसर अस्पतालों में रेफर किया जाता है। डॉ. सलाेनी का कहना है कि विभाग ने निरोगी काया जैसे अभियानों के तहत घर- घर स्क्रीनिंग की कोशिश की है।


