झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि सरकार और उसके अधिकारी न्यायिक प्रक्रिया को बाधित करने के लिए निराधार और दुर्भावनापूर्ण याचिकाएं दाखिल कर रहे हैं। चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने राज्य सरकार की ओर से दायर पुनर्विचार याचिका को फर्जी और निराधार करार देते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों पर एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। कोर्ट ने जुर्माने की राशि चार सप्ताह के भीतर झारखंड राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (झालसा) में जमा करने का आदेश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 20 जनवरी को निर्धारित की गई है। यह मामला आरके कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड से जुड़ा है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि 25 अगस्त 2025 को पारित पूर्व आदेश में मामले के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की गई थी। उस आदेश में केवल सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्देशों के अनुपालन में निचली अदालत को निर्धारित समय-सीमा के भीतर फैसला करने को कहा गया था। इसके बावजूद राज्य सरकार द्वारा पुनर्विचार याचिका दाखिल करना अदालत के अनुसार केवल निष्पादन कार्यवाही को रोकने की मंशा को दर्शाता है। अदालत ने सरकार को बलशाली वादी और संबंधित कंपनी को कमजोर पक्ष बताते हुए कहा कि राज्य सरकार का दायित्व है कि वह ईमानदार और वैध दावों का सम्मान करे, न कि तकनीकी हथकंडों के जरिए नागरिकों और संस्थानों को अनावश्यक रूप से परेशान करे। अदालत ने टिप्पणी की कि इस तरह की अनावश्यक मुकदमेबाजी से सार्वजनिक धन की खुली बर्बादी हो रही है, जिसकी जिम्मेदारी अधिकारियों पर तय होनी चाहिए। हाईकोर्ट ने भविष्य के लिए सख्त चेतावनी भी दी है। अदालत ने निर्देश दिया कि अब राज्य सरकार की ओर से दायर की जाने वाली अपील, पुनरीक्षण या संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत याचिकाएं तभी स्वीकार की जाएंगी, जब उनके साथ झारखंड राज्य मुकदमा नीति के पालन का प्रमाण पत्र संलग्न होगा।


