बजरी का महंगा होना, इसकी किल्लत तथा अवैध माफियाओं के झंझट से मुक्ति की उम्मीद जागी है। हाल ही में नई एम-सेंड पॉलिसी जारी की गई है। अब बजरी के विकल्प के रूप में एम-सेंड बजरी मिल सकेगी। इसके लिए नई एम-सेंड इकाइयों की स्थापना की जाएगी। शुरुआत में हरेक जिले में दो-दो एम सेंड इकाइयां शुरू होंगी। इसके लिए खनन विभाग प्लॉट तैयार करने की प्रक्रिया में जुटा है। इसके बाद खान विभाग जल्द ही एम-सेंड इकाइयों की स्थापना के लिए ई-नीलामी करेगा। निदेशालय की ओर से जिला मुख्यालयों को ऐसे प्लॉट चिह्नित करने के निर्देश दिए गए हैं। प्रस्तावों के बाद ई-नीलामी की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। गौरतलब है कि प्रदेश में बजरी के ठेके कम होने के कारण लोगों को इसके लिए काफी परेशान होना पड़ रहा था। अब सरकार ने एम- सेंड नीति के साथ- साथ कई बजरी प्लॉटों की ई- नीलामी की है। अगले साल मार्च तक सभी में खनन शुरू होने के बाद बजरी की उपलब्धता आसान हो जाएगी। इससे न केवल सरकारी प्रोजेक्ट समय पर पूरे हो पाएंगे, बल्कि आम लोगों को भी उनके मकान व अन्य निर्माण कार्यों के लिए सस्ती बजरी मिल पाएगी। अब तक बजरी की मारामारी में कई जगह पर माफिया आमने सामने होकर कानून व्यवस्था के लिए चुनौती बन गए थे। ऐसे हालात के चलते ही बजरी के विकल्प के रूप में नई एम-सेंड नीति जारी की गई है। ये इकाइयां चालू होने से नदियों से बजरी का खनन कम होगा। सरकार ने उसके लिए 50 रुपए प्रति टन की रॉयल्टी निर्धारित कर रखी है। उद्योग का दर्जा भी मिलेगा, ऋण सहित कई प्रोत्साहन नई नीति में एम-सेंड पॉलिसीी में ऐसी इकाइयों को उद्योग का दर्जा देने का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही राजस्थान निवेश प्रोत्साहन योजना में विशेष रियायतें दी गई हैं। ताकि बजरी का अच्छा विकल्प सफल हो जाए। बिजली, ऋण सहित कई सुविधाएं दी जाएंगी। इकाई की स्थापना में 3 साल के अनुभव व 3 करोड़ के टर्न ओवर की बाध्यता भी समाप्त कर दी गई है। उम्मीद है। सरकारी प्रोजेक्टों में 50 प्रतिशत एम-सेंड मात्रा तय
अब तक सरकारी प्रोजेक्टों में एम-सेंड बजरी का 25 प्रतिशत उपयोग करना जरूरी था। अब एम- सेंड के इस्तेमाल को बढ़ाने के लिए नई पॉलिसी में यह प्रतिशत दोगुना यानी 50 प्रतिशत कर दिया है। ताकि इकाइयां सफल हो जाएं और सरकारी निर्माण कार्यों में गुणवत्ता आए। एम-सेंड का उत्पादन प्रतिवर्ष 20 प्रतिशत बढ़ाने की भी योजना है।


