गलत ड्रॉप से जली बच्ची की आंख, डॉक्टरों ने बदली:पहली बार GMC में 7 दिन में 6 नेत्रदान, 5 कॉर्निया ट्रांसप्लांट; अपनाई गईं तीन मॉडर्न तकनीक

आंखों में खुजली होने पर मेडिकल स्टोर से बिना डॉक्टर की सलाह आई ड्रॉप खरीदकर डालना कितनी बड़ी भूल साबित हो सकता है, इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण भोपाल की 15 साल की बच्ची है। गलत स्टेरॉइड बेस्ड आई ड्रॉप से उसकी आंख का कॉर्निया जल गया और देखने की क्षमता लगभग खत्म हो गई। हालात इतने बिगड़े कि कॉर्निया फटने की नौबत आ गई। राहत की बात यह रही कि गांधी मेडिकल कॉलेज (GMC) भोपाल में दान में मिली कॉर्निया से समय रहते ट्रांसप्लांट कर बच्ची की आंख की रोशनी बचा ली गई। यही नहीं, बीते 7 दिनों में GMC में कुल 5 कॉर्निया ट्रांसप्लांट किए गए हैं। यह मध्यप्रदेश के सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पहली बार हुआ है, जब इतने कम समय में 6 नेत्र दान में मिले और 5 मरीजों को नई रोशनी दी जा सकी। 7 दिन में 6 ने किया नेत्रदान, 5 का हुआ प्रत्यारोपण
हमीदिया अस्पताल में कॉर्निया ट्रांसप्लांट करने वाली कॉर्निया स्पेशलिस्ट डॉ. भारती आहूजा ने बताया कि नेत्रदान को लेकर लोगों में जागरूकता बढ़ने का यह प्रत्यक्ष परिणाम है। 23 दिसंबर से 30 दिसंबर के बीच GMC को कुल 6 कॉर्निया दान में मिलीं। इनमें से 5 कॉर्निया का उपयोग हमीदिया अस्पताल में भर्ती मरीजों के ट्रांसप्लांट के लिए किया गया, जबकि एक कॉर्निया भोपाल के एक अन्य संस्थान में भर्ती मरीज को उपलब्ध कराई गई। दो मरीज, एक ही गलती… केस-1: आंखों की खुजली थी, गलत ड्रॉप ने जला दिया कॉर्निया
भोपाल की 15 वर्षीय बच्ची को करीब 6 महीने पहले आंखों में खुजली शुरू हुई। लक्षण सामान्य एलर्जी जैसे थे। बच्ची ने पिता को बताया, इसके बाद उन्होंने डॉक्टर को दिखाने की बजाय मेडिकल स्टोर से आई ड्रॉप खरीद ली। ड्रॉप स्टेरॉयड बेस्ड थी। शुरुआत में खुजली बंद हुई तो लगा कि दवा असर कर रही है, लेकिन भीतर ही भीतर कॉर्निया को नुकसान पहुंच रहा था। धीरे-धीरे बच्ची की आंख में कॉर्निया अल्सर बन गया और कॉर्निया फट गई। राहत की बात यही थी कि आंख का वह हिस्सा सुरक्षित था, जो देखने के लिए सबसे अहम होता है। दान में मिली कॉर्निया से प्रभावित हिस्सा बदला गया और अब बच्ची को दोबारा दिखाई देने लगा है। केस-2: आंख लाल हुई, खुद से डाली ड्रॉप
इसी तरह भोपाल निवासी 30 वर्षीय राहुल ने आंख लाल होने पर खुद से स्ट्रॉन्ग आई ड्रॉप डाल ली। ड्रॉप इतनी तीव्र थी कि उसने कॉर्निया के निचले हिस्से को गलाना शुरू कर दिया। पहले कॉर्निया अल्सर बना और फिर धीरे-धीरे दृष्टि चली गई। हमीदिया अस्पताल में कॉर्निया ट्रांसप्लांट के बाद अब उसकी आंखों की रोशनी लौट रही है, हालांकि मरीज अभी डॉक्टरों की निगरानी में है। असफल मोतियाबिंद ऑपरेशन के बाद मिली नई रोशनी
इन दो मामलों के अलावा GMC के नेत्र विभाग में तीन अन्य मरीजों का भी कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया गया। इनमें से दो 60 वर्ष से अधिक उम्र की महिलाएं थीं, जिनका निजी अस्पतालों में मोतियाबिंद ऑपरेशन असफल रहा था। कई अस्पतालों में भटकने के बाद वे हमीदिया पहुंचीं, जहां तीन महीने के इलाज के बाद उनका सफल कॉर्निया ट्रांसप्लांट किया गया। इसी तरह एक बुजुर्ग पुरुष में भी नेत्र प्रत्यारोपण कर उसकी आंख की संरचना और दृष्टि को बचाया गया। ट्रांसप्लांट में अपनाई गईं तीन मॉडर्न तकनीक 1. लैमलर केराटोप्लास्टी
इस प्रक्रिया में कॉर्निया (आंख की पारदर्शी सतह) की केवल खराब या प्रभावित परत को हटाकर उसकी जगह दाता की स्वस्थ परत प्रत्यारोपित की जाती है। पूरी कॉर्निया बदलने की बजाय आंशिक ट्रांसप्लांट किया जाता है, जिससे आंख की प्राकृतिक संरचना अधिक सुरक्षित रहती है। यह तकनीक उन मरीजों के लिए उपयुक्त होती है, जिनमें कॉर्निया की ऊपरी या मध्य परत खराब हो गई हो, लेकिन अंदर की परतें स्वस्थ हों। इससे रिजेक्शन का खतरा कम रहता है और रिकवरी अपेक्षाकृत जल्दी होती है। 2. एंडोथीलियल केराटोप्लास्टी
इस तकनीक में कॉर्निया की सबसे अंदरूनी परत यानी एंडोथीलियम को बदला जाता है। यह परत कॉर्निया को साफ और पारदर्शी बनाए रखने में अहम भूमिका निभाती है। जब यह परत खराब हो जाती है, तो आंख में सूजन और धुंधलापन आ जाता है। इस प्रक्रिया में केवल पतली एंडोथीलियम परत बदली जाती है, जिससे सर्जरी कम जटिल होती है, टांकों की जरूरत कम पड़ती है और मरीज की दृष्टि जल्दी सुधरती है। 3. पैच ग्राफ्टपैच ग्राफ्ट
एक आपातकालीन सर्जरी होती है, जिसमें कॉर्निया के किसी छोटे लेकिन गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हिस्से को ढकने या मजबूत करने के लिए डोनर टिश्यू का पैच लगाया जाता है। इसका उद्देश्य दृष्टि सुधार से ज्यादा आंख की संरचना को बचाना और संक्रमण या छेद (परफोरेशन) को रोकना होता है। एचओडी के परिवार से भी हुआ नेत्रदान
नेत्र विभाग की एचओडी डॉ. कविता कुमार लंबे समय से नेत्रदान को बढ़ावा दे रही हैं। बीते सप्ताह दान में मिली 6 कॉर्निया में से एक उनके परिवार के बुजुर्ग सदस्य द्वारा दान की गई, जिसने अन्य लोगों को भी प्रेरित किया। इन डॉक्टरों और स्टाफ की अहम भूमिका
कॉर्निया स्पेशिलिस्ट डॉ. भारती आहूजा के साथ डॉ. एस.एस. कुबरे, डॉ. अदिति, डॉ. नैना, डॉ. शाहिद चंदेरी, डॉ. अपूर्वा एस. पाई, डॉ. सोनालिका, डॉ. आकांक्षा, डॉ. स्नेहा, डॉ. एकता, नर्सिंग ऑफिसर सीमा और मोनिका सहित पूरा सपोर्टिंग स्टाफ शामिल रहा। एनेस्थीसिया टीम से डॉ. शशि कुमारी का विशेष सहयोग रहा। HCRP से बढ़ रही नेत्रदान की संख्या
हमीदिया अस्पताल में हॉस्पिटल कॉर्नियल रिट्रीवल प्रोग्राम (HCRP) के तहत अस्पताल में मृत्यु के बाद परिजनों को नेत्रदान के लिए जागरूक किया जा रहा है। इसी पहल से नेत्रदान की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। खुद से आई ड्रॉप डालना पड़ सकता है भारी
डॉ. आहूजा के अनुसार, नेत्रदान और आंखों के इलाज से जुड़ी जानकारी के लिए लोग इंटरनेट पर खोज करते हैं, जहां कई बार गलत जानकारियां मिल जाती हैं। ऐसे में हेल्पलाइन के जरिए सही और प्रमाणिक जानकारी दी जा रही है।

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