भरतपुर। विश्वप्रसिद्ध पक्षी अभयारण्य केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान से हर वर्ष वन विभाग को लाखों रुपये की आय होती है, लेकिन उसी परिसर में स्थित प्राचीन 350 वर्ष पुराने केवलादेव महादेव मंदिर की अवहेलना की जा रही है। मंदिर की देखभाल और पूजा-अर्चना का पूरा खर्च पुजारी अपनी निजी जेब से उठा रहा है। केवलादेव पक्षी विहार में पहले कभी घना जंगल हुआ करता था और पक्षियों का शिकार करने के लिए राजा-महाराजा यहां करते थे। केले के पेड़ के पास ही महाराजा सूरजमल को शिवलिंग के दर्शन हुए थे और उन्हीं के द्वारा मंदिर की स्थापना कराई गई थी। केले के पेड़ के पास शिवलिंग होने के कारण इस मंदिर का नाम केवलादेव पड़ गया। वर्तमान में देवस्थान के सुपुर्द श्रेणी में यह मंदिर आता है। मंदिर के पुजारी जगपाल नाथ बताते हैं कि वर्षों से वह भगवान की सेवा अपने सीमित संसाधनों से कर रहे हैं। मंदिर की दीवारों की पुताई, साफ-सफाई, दीप-धूप और छोटी-मोटी मरम्मत तक के लिए कोई सरकारी सहायता नहीं मिलती। श्रद्धालुओं की सहायता से मंदिर की रंगाई-पुताई करा दी जाती है। बाकी पूजा की सभी सामग्री का खर्च अपनी जेब से करता हूं। न ही सरकार की तरफ से सहायता मिलती न ही वन विभाग की ओर से। आय लाखों में, सहायता शून्य:- मंदिर पुजारी ने बताया कि राष्ट्रीय उद्यान में प्रवेश टिकट, पर्यटन गतिविधियों और अन्य शुल्कों से विभाग को अच्छी-खासी आमदनी होती है, लेकिन मंदिर के संरक्षण के नाम पर कोई बजट निर्धारित नहीं है। परिणामस्वरूप मंदिर की रंगाई-पुताई, फर्श की मरम्मत और मूलभूत सुविधाएं तक पुजारी और कुछ श्रद्धालुओं के सहयोग से ही पूरी की जाती हैं। वहीं, टिकिट लगने के कारण श्रद्धालु भी बहुत ही कम की संख्या में दर्शन तक पहुंच पाते हैं।


