मई 2026 से शुरू होने वाली जनगणना के दौरान सबसे बड़ी दिक्कत लोगों की दोहरी गणना को लेकर आएगी। दरअसल छत्तीसगढ़ में उत्तर प्रदेश-बिहार, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, ओडिशा जैसे पड़ोसी राज्यों के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं। उनका घर मूल प्रांत में हैं, लेकिन रोजगार-धंधा छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में है। अकेले राजधानी रायपुर में कम से कम पांच से छह लाख फ्लोटिंग पापुलेशन होने का अनुमान है। प्रदेश की वर्तमान जनसंख्या लगभग तीन करोड़ है। इसका 7 प्रतिशत भी मानें तो उनकी संख्या 21 लाख से ज्यादा हैं। इनमें रोजी-मजदूरी करने वालों के अलावा बड़ी संख्या में विद्यार्थी और प्राइवेट संस्थानों में नौकरी करने वाले लोग शामिल हैं। मकानों की लिस्टिंग के दौरान उनकी गिनती मूल प्रदेशों में होगी। दूसरे चरण में लोगों की गिनती के दौरान वे छत्तीसगढ़ में गिने जाएंगे। इस वजह से डबल एंट्री एक बड़ी चुनौती होगी।
इसकी सबसे बड़ी वजह यह भी है कि राज्य बनने के समय 2000 में छत्तीसगढ़ की जनसंख्या 2.08 करोड़ थी। नया राज्य होने के कारण रोजगार और विकास की संभावना को देखते हुए बड़ी संख्या में दूसरे प्रदेशों के लोग छत्तीसगढ़ आए। 20-25 सालों से छत्तीसगढ़ में रहते हुए बहुत से लोगों ने यहीं घर बना लिया। उनके लिए जनगणना में दिक्कत नहीं होगी। क्योंकि उनका यहां खुद का घर है। मकानों की लिस्टिंग और लोगों की गिनती के दौरान आंकड़ों में फर्क नहीं आएगा। दिक्कत उन लोगों की वजह से होगी, जो किराए के घरों में रह रहे हैं। मकानों की लिस्टिंग के दौरान यहां रहने वाले लोगों की संख्या दर्ज की जाएगी। यही संख्या उनके मूल प्रदेशों में स्थित घरों में भी दर्ज होगी। दूसरे चरण के दौरान जब लोगों की गिनती की जाएगी तब भी इस तरह की डबल एंट्री की आशंका बनी रहेगी।
दूसरे प्रदेशों में भी छत्तीसगढ़ के लोग
इसी तरह छत्तीसगढ़ की भी बड़ी जनसंख्या दूसरे प्रदेशों में काम के सिलसिले में जाती है। छत्तीसगढ़ से बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, गुजरात, बैंगलुरू इत्यादि राज्यों में जाते हैं। उनकी भी डबल एंट्री की आशंका बनी रहती है। जैसे रायगढ़ का एक मजदूर 8 महीने महाराष्ट्र में काम करता है और 4 महीने गांव आता है। गांव में परिवार उसे यह यहीं का सदस्य है कहकर गिना देगा और महाराष्ट्र में भी मकान मालिक उसे निवासी बताकर दर्ज करा दे तो सैद्धांतिक रूप से डबल एंट्री का जोखिम बन सकता है। छत्तीसगढ़–ओडिशा या छत्तीसगढ़–झारखंड सीमा के गांवों में लोग रोज आना-जाना करते हैं। कुछ परिवारों के पास दोनों राज्यों में जमीन/मकान हैं। ऐसे मामलों में स्थानीय स्तर पर भ्रम की स्थिति बनती है, इसलिए सुपरविजन और क्रॉस-वेरिफिकेशन जरूरी होता है। हालांकि अफसरों का कहना है कि इस दिक्कत से निपने के लिए इस बार तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। एप और वेबसाइट का उपयोग करेंगे। इससे दोहरी गणना की संभावना बहुत कम रह जाएगी। ट्रेनिंग के दौरान भी प्रगणकों को इसी बात का प्रशिक्षण दिया जाएगा कि वे व्यक्ति को “सामान्य निवास” के आधार पर ही दर्ज करें। निवास की अवधि छह माह या उससे अधिक होनी चाहिए। स्वतंत्रता के बाद आठवीं जनगणना: सीएम बोले- यह केवल गिनती नहीं छत्तीसगढ़ में जनगणना-2027 की तैयारियों को लेकर बुधवार को राज्य व संभाग स्तरीय अधिकारियों का प्रशिक्षण सम्मेलन आयोजित किया गया। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि जनगणना केवल जनसंख्या की गिनती नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है। उन्होंने अधिकारियों से इस राष्ट्रीय दायित्व को गंभीरता, सटीकता और संवेदनशीलता से निभाने का आह्वान किया। मुख्यमंत्री ने बताया कि 2027 की जनगणना स्वतंत्रता के बाद आठवीं और देश की पहली पूर्णतः डिजिटल जनगणना होगी। मोबाइल ऐप और वेब पोर्टल के जरिए डेटा संकलन से प्रक्रिया तेज और पारदर्शी बनेगी। राज्य में 1 मई से 30 मई 2026 तक मकान सूचीकरण का कार्य 33 जिलों, 252 तहसीलों और 19,978 गांवों में किया जाएगा। मुख्य सचिव विकासशील ने अधिकारियों को तय समय-सीमा में काम पूरा करने के निर्देश देते हुए कहा कि मैदानी कर्मियों को सपोर्टिव सुपरविजन के जरिए लगातार मार्गदर्शन देना होगा। उन्होंने नई भवन अनुज्ञाओं को ट्रेस करने और सीमावर्ती जिलों में अन्य राज्यों में गए लोगों की दोहराव वाली गणना से बचने पर विशेष जोर दिया। इस अवसर पर भारत के रजिस्ट्रार जनरल एवं जनगणना आयुक्त का कार्यालय के महारजिस्ट्रार मृत्युंजय कुमार नारायण ने कहा कि भारतीय जनगणना 150 वर्षों की परंपरा वाली प्रक्रिया है, जो नीति निर्माण और विकास योजनाओं का आधार तय करती है। सम्मेलन में गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव मनोज पिंगुआ, सचिव राहुल भगत तथा राज्य जनगणना निदेशक कार्तिकेय गोयल सहित वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।


