आदिवासी क्षेत्रों से आदिवासी ग्रामीण पलायन न करें इसलिए दो वन समितियां आदिवासी परिवारों को फ्री में सूखी घास मुहैया करा रही है। इससे वह अपने पशुओं को तो चारा दे ही रहे हैं साथ ही खुद भी इसे बेचकर कमाई करने लगे हैं। ऐसे करीब 25-30 परिवार हैं जिन्हें झिरपांजरिया और कमलखेड़ा की समिति फ्री में घास मुहैया करा रही है। अगर वे पलायन करते तो परिवार सहित करीब 150 से अधिक की संख्या में पलायन कहलाता, लेकिन फिलहाल दो गांवों में घास के माध्यम से पलायन रोकने की कोशिश वन समिति ने की है। दरअसल, हर साल आदिवासी क्षेत्रों से मजदूरी के लिए आदिवासी ग्रामीण महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक सहित अन्य शहरों में पलायन करते हैं। यह परंपरा आज भी कायम है, लेकिन कम से कम दो गांव इससे फिलहाल बच गए हैं, क्योंकि यहां दो गांवों झिरपांजरिया और कमलखेड़ा के आदिवासी परिवारों को वन समिति के माध्यम से घास काटकर खुद ही बेचने की अनुमति दी जा रही है, जिससे उन्हें फायदा हो रहा है। पहले यह आदिवासी परिवार पशुओं के लिए घास महाराष्ट्र सहित दूसरे शहरों से लाते थे, जिस पर उन्हें पैसा खर्च करना पड़ता था, लेकिन अब उन्हें यहां से फ्री घास दी जाने लगी है जिसे वह बेच भी रहे हैं और उससे कमाई हो रही है। आदिवासी युवाओं, ग्रामीणों को कर रहे प्रेरित
वन रक्षक कमलेश रघुवंशी ने बताया वन समितियों द्वारा वन क्षेत्र की सुरक्षा और युवाओं को रोजगार के लिए प्रेरित किया जा रहा है। वन क्षेत्र के आसपास रहने वाले आदिवासी युवाओं को बाहर मजदूरी करने न जाने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है। झिरपांजरिया रासबाली वन समिति के अध्यक्ष मेहताप लूहारे ने बताया घास ग्रामीणों को फ्री मुहैया कराई जा रही है, जिससे वह बाजार में बेचकर पैसा कमा रहे हैं। करीब 25-30 परिवार ऐसे हैं जो घास काट रहे हैं। उनके परिवार अब पलायन नहीं कर रहे हैं। समिति अध्यक्ष ने बताया आने वाले समय में वन समिति पौधा रोपण क्षेत्र में जाली, खंभे की मरम्मत घास से मिलने वाली आय से कराएगी। वन समिति कमलखेड़ा के अध्यक्ष अनसिंग मोरे ने बताया सूखी घास से आदिवासी समाजजन को फायदा हो रहा है। देखिए तस्वीरें…


