सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल (सीएटी) की चंडीगढ़ बेंच ने चंडीगढ़ पुलिस के पांच रिटायर्ड ग्रुप-सी कर्मचारियों को बड़ी राहत प्रदान की है। ट्रिब्यूनल ने उनके डेथ-कम-रिटायरमेंट ग्रेच्युटी (डीसीआरजी) से की गई अतिरिक्त भुगतान की वसूली को अवैध करार देते हुए रद्द कर दिया है। साथ ही, अधिकारियों को आदेश दिया है कि वसूली गई रकम को जीपीएफ दर पर ब्याज सहित 8 सप्ताह में लौटाया जाए। यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के रफीक मसीह और थॉमस डेनियल मामलों पर आधारित है। रिटायरमेंट के समय एनओसी जारी की इन मुलाजिमों में सुरजीत सिंह,हरदेव सिंह, जसबीर सिंह, करमबीर और (केशो राम) शामिल है। सभी चंडीगढ़ पुलिस से रिटायर्ड हैं और उनकी उम्र 61 से 64 वर्ष के बीच है।आवेदकों ने याचिका में दलील दी कि वे 1983 में चंडीगढ़ पुलिस में कांस्टेबल के रूप में भर्ती हुए थे और बाद में इंस्पेक्टर के पद तक पदोन्नत हुए। वे 2019 में वॉलंटरी रिटायरमेंट ले चुके थे। रिटायरमेंट से पहले विभाग ने उन्हें ‘नो ड्यूज सर्टिफिकेट’ जारी किया था और पेंशन पेमेंट ऑर्डर (पीपीओ) के तहत सभी रिटायरल लाभ जारी कर दिए गए थे। रिवाइज्ड पे के लिए ऑप्शन फॉर्म तो आरोप लगाया 2021 में चंडीगढ़ प्रशासन ने पंजाब सिविल सर्विसेज (रिवाइज्ड पे) रूल्स, 2021 को अपनाया, जो 1 जनवरी 2016 से प्रभावी था। जब उन्होंने रिवाइज्ड पे के लिए ऑप्शन फॉर्म जमा किया। इस दौरान अकाउंटेंट जनरल ने उनकी पे फिक्सेशन रिवाइज की, लेकिन साथ ही पाया कि 2007 में उनके पे को जूनियर (दलबीर सिंह) के साथ स्टेप-अप करने के बाद वार्षिक इंक्रीमेंट की तारीख गलत तरीके से लागू की गई थी। इससे अतिरिक्त भुगतान हुआ, जिसकी वसूली डीसीआरजी से कर ली गई। उदाहरण के लिए, सुरजीत सिंह से 1,02,468 रुपये वसूले गए।
रिटायरमेंट के तीन साल बाद की गई रिकवरी जबकि उन्होंने दिया कि यह गलती विभाग की थी, न कि उनकी। उन्हें कोई शो-कॉज नोटिस नहीं दिया गया और वसूली रिटायरमेंट के तीन साल बाद की गई, जो सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के खिलाफ है। उन्होंने डीओपीटी के 2 मार्च 2016 के ओएम का हवाला दिया, जिसमें रिटायर्ड ग्रुप-सी कर्मचारियों से प्रशासनिक गलती के कारण अतिरिक्त भुगतान की वसूली प्रतिबंधित है। चंडीगढ़ प्रशासन, फाइनेंस सेक्रेटरी, डीजीपी, एसएसपी और अकाउंटेंट जनरल ने वसूली को पंजाब सिविल सर्विसेज रूल्स के तहत जायज ठहराया। उनका कहना था कि स्टेप-अप के साथ इंक्रीमेंट की तारीख जूनियर के साथ एलाइन नहीं की गई थी, जिससे अतिरिक्त भुगतान हुआ। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के गुरचरण सिंह मामले (2014) का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि गलती से दिए गए पैसे की वसूली हो सकती है। साथ ही, आवेदकों ने रिटायरमेंट पर एक अंडरटेकिंग दी थी कि भविष्य में कोई रिकवरी होने पर वे सहमत हैं। गलती विभाग की लापरवाही से हुई ट्रिब्यूनल ने पाया कि आवेदकों में कोई धोखाधड़ी या गलत बयानी नहीं थी। गलती विभाग की लापरवाही से हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के रफीक मसीह मामले में बताई गई श्रेणियों के तहत ग्रुप-सी और रिटायर्ड कर्मचारियों से वसूली अवैध है। थॉमस डेनियल मामले में भी लंबे समय बाद वसूली को अनुचित माना गया है। ट्रिब्यूनल ने नोट किया कि 5 अप्रैल 2023 का इंपुग्न्ड ऑर्डर आवेदकों को नहीं भेजा गया, जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। ट्रिब्यूनल ने पहले के ओए 581/2024 के फैसले का हवाला दिया, जिसे 2 जनवरी 2026 को लागू किया गया था। परिणामस्वरूप, सभी ओए में वसूली आदेश रद्द कर दिए गए।


