चित्तौड़गढ़ में अफीम की फसल तैयार, शुरू हुई चिराई:20 से 25 दिन तक चलेगा अफीम संग्रहण का काम, अप्रैल की तौल तक जारी रहेगी कड़ी निगरानी

चित्तौड़गढ़ जिले में अफीम की फसल अब पूरी तरह तैयार हो चुकी है और किसानों ने डोडों पर चीरा लगाने का काम शुरू कर दिया है। करीब तीन महीने की मेहनत के बाद यह फसल इस स्थिति में पहुंची है। बोवनी से लेकर अब तक किसानों ने दिन-रात खेतों में मेहनत की है। कई बार ठंड, गर्मी और भूख-प्यास की परवाह किए बिना उन्होंने फसल की देखभाल की। अब डोडों में लूनी चीरनी यानी चीरा लगाने की प्रक्रिया शुरू हो गई है। चीरा लगाने के बाद अगले दिन सुबह डोडों से अफीम एकत्र की जाती है। किसानों का कहना है कि अब रोज सुबह अफीम इकट्ठा करने का काम चलेगा और यह सिलसिला 20 से 25 दिनों तक चलेगा। गांवों में मां कालिका के पूजन के साथ इस काम की शुरुआत की गई है, जिसे किसान शुभ मानते हैं। फसल की सुरक्षा को लेकर बढ़ी चिंता, पुलिस भी सतर्क अफीम की फसल तैयार होते ही किसानों की चिंता भी बढ़ गई है। अब उन्हें तस्करों और चोरी की घटनाओं का डर सता रहा है। किसान अपने खेतों और घरों पर कड़ी निगरानी रख रहे हैं। परिवार का कम से कम एक सदस्य दिन-रात फसल की रखवाली में लगा रहेगा। अफीम की कीमत ज्यादा होने के कारण चोरी का खतरा बना रहता है। निगरानी का सिलसिला अप्रैल महीने में होने वाले तौल तक चलेगा। दूसरी ओर पुलिस भी सतर्क हो गई है। अफीम चोरी की घटनाओं को रोकने के लिए गश्त बढ़ाई जा रही है और संदिग्ध गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है। पुलिस का कहना है कि किसी भी प्रकार की अवैध गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 20 से 25 दिन तक चलेगा चीरा लगाने का काम किसान राजन माली के अनुसार डोडों पर चीरा लगाने का काम करीब 20 से 25 दिन तक चलेगा। हर डोडे पर चार से पांच चीरे लगाए जाते हैं। इसके बाद उससे निकलने वाली लचीली अफीम को रोज सुबह खुरचकर इकट्ठा किया जाता है। किसानों का अनुमान है कि 10 आरी क्षेत्रफल में बोई गई फसल से करीब 6 से 7 किलो अफीम का उत्पादन हो सकता है। हालांकि अंतिम मात्रा मौसम और देखभाल पर भी निर्भर करती है। किसान उम्मीद कर रहे हैं कि इस बार उत्पादन अच्छा रहेगा, क्योंकि फसल की बढ़वार ठीक रही है। नारकोटिक्स विभाग ने दिए दो तरह के पट्टे इस साल नारकोटिक्स विभाग ने किसानों को दो तरह के पट्टे दिए हैं। जिन किसानों ने पिछली बार सरकार के तय मापदंड के अनुसार उत्पादन किया था, उन्हें चीरा पद्धति वाले पट्टे दिए गए हैं। वहीं जिन किसानों का उत्पादन कम रहा था या जिनके पट्टे कई साल पहले कट चुके थे और इस बार फिर से जारी हुए हैं, उन्हें सीपीएस पद्धति के पट्टे दिए गए हैं। सीपीएस पद्धति में डोडों पर चीरा नहीं लगाया जाता। इसमें किसान डोडों में छेद कर पोस्तादाना निकालते हैं और बाद में खाली डोडा यानी छिलका विभाग को बेचते हैं। बताया जा रहा है कि 10 आरी पट्टे से करीब 60 किलो डोडे का उत्पादन होता है। हालांकि इस बार विभाग की ओर से खरीद दरें अभी तय नहीं की गई हैं, जिसका किसानों को इंतजार है।

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