छत्तीसगढ़ के बालोद जिले का पिकरीपार गांव पंचायत चुनावों में एक अनूठी मिसाल पेश कर रहा है। यहां पिछले 10 सालों से सरपंच और पंच निर्विरोध चुने जा रहे हैं। गांव की खास बात यह है कि यहां दो बार महिलाओं को सरपंच बनने का मौका दिया गया है। पिकरीपार पंचायत में एक आश्रित गांव तिलखैरी भी शामिल है। दोनों गांवों को बारी-बारी से सरपंच बनने का अवसर मिलता है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव प्रचार में खर्च होने वाले पैसे को वे गांव के विकास कार्यों में लगाते हैं। इससे न केवल महंगे खर्चों से बचत होती है, बल्कि गांव में आपसी सामंजस्य भी बना रहता है। पंचायत में कुल 10 वार्ड हैं और सभी वार्डों के पंच भी निर्विरोध चुने जाते हैं। इस व्यवस्था से गांव में किसी तरह का विवाद नहीं होता है। यह गांव अन्य पंचायतों के लिए एक आदर्श उदाहरण बन गया है। बैठक कर लेते हैं निर्णय इस गांव की यह परंपरा पूरे जिले भर में चर्चा का विषय बना हुआ है। गांव के वरिष्ठ नागरिक श्यामलाल साहू ने बताया कि बैठक करते हैं और सभी को मौका देने की बात पहले से ही हमने रखी हुई थी तो बारी-बारी सबको मौका दिया जाता है। कभी इस क्षेत्र से कभी उसे क्षेत्र से और एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर सामंजस्य बनाया जाता है, जिसे सभी का समर्थन हासिल हो। पिछले बार चंदा साहू, इस बार पंचशीला आपको बता दें कि गांव ने सर्वसम्मति से यहां पर पिछले चुनाव में चंदा साहू को सरपंच बनाया था। ग्रामीणों ने बताया कि उनका कार्यकाल बहुत अच्छा था और सरपंच बनने के साथ ही यहां पर सभी कार्यों में उनका समर्थन भी किया जाता है। विरोध जैसा कोई स्वर नहीं होता। वहीं इस बार पंचशीला साहू को ग्रामीणों ने मौका दिया है। दोनों ने बताया कि हमारे गांव की यह रीति-नीति हमें काफी प्रभावित करती है और जो पैसा हम चुनाव में बचा रहे हैं, उसे गांव की छोटी-छोटी समस्याओं और विकास कार्यों में खर्च करते हैं। लोकतंत्र के लिए बाहुबल नहीं, सामंजस्य जरूरी पहले अक्सर यह सवाल उठता था कि क्या लोकतंत्र जीत पाएगा या फिर बाहुबली का दबदबा रहेगा। हालांकि, जिस गांव की यहां चर्चा हो रही है, वहां बाहुबली का कोई स्थान नहीं है। यहां का केंद्र बिंदु आपसी सामंजस्य है, जहां ना तो दबाव चलता है, ना पैसा और न ही कोई बाहुबली। यहां जो प्रमुख बात है, वह है विकास, सामंजस्य और भाईचारा।


