भास्कर न्यूज | जैंतगढ़ आदिवासी समाज का सबसे बड़ा मागे पर्व गुमुरिया और पट्टाजैंत गांव में पारंपरिक आदिवासी रीति रिवाज से सोमवार को धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया गया। इस अवसर पर पूरे गांव में उत्साह का माहौल बना रहा। लोग नए वस्त्रों में सजे संवरे नजर आए। हर तरफ खुशी का माहौल दिखाई दे रहा था। मागे पर्व आदिवासी हो समाज का सबसे बड़ा पर्व है। यह पर्व छह दिनों तक मनाया जाता है। प्रथम दिन गऊमाराह पर्व मनाया गया। इस अवसर पर घर में पूजा की गई तथा मुर्गे की बलि दी गई। दूसरे दिन ओतेएली इसी तरह, गोरीपर्व, मरांगपर्व, बासीपार्व मनाया गया। बुधवार को हारमागेया पर्व के साथ ही मागे पर्व सम्पन्न हो जाएगा। पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार मुख्य देऊरी और सहायक देऊरी द्वारा मरांगपर्व के दिन गांव की सुख-समृद्धि, शांति एवं मंगल कामना के लिए विधिवत पूजा-अर्चना कराई। इसमें हजारों की संख्या में ग्रामीण श्रद्धा के साथ कार्यक्रम में शामिल हुए। मांडर की धुन पर ग्रामीणों ने सामूहिक नृत्य किया पूजा-अर्चना के बाद गांव में पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। मांदर की धुन पर ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से पारंपरिक नृत्य और गीत प्रस्तुत किया। इस दौरान युवा, महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे सभी उत्साह के साथ शामिल हुए और पूरे गांव में दिन भर पर्व जैसा माहौल बना रहा। बुधवार को हार मगैया पर्व के साथ ही पर्व संपन्न हो जाएगा। मागे पर्व धर्म और संस्कृति का महत्वपूर्ण पर्व है, जो माघ महीने (जनवरी-फरवरी) में मनाया जाता है और सृष्टि रचना व प्रकृति पूजा से जुड़ा है, जिसमें समानता, सह-अस्तित्व और मानव उत्पत्ति का जश्न मनाया जाता है। यह पर्व “माता’ (मागे) को समर्पित है और इसमें सिंगबोंगा देवता की पूजा की जाती है, जिन्होंने लुकु बुले (आदि पिता) और लुकु बुली (आदि माता) की रचना की थी।


