छात्रों को सीखानी चाहिए डिजीटल लिटरेसी, एआई के दौर में बच्चों में क्रिटिकल थिंकिंग पर दें जोर

भास्कर न्यूज | जालंधर आज के समय में स्कूली शिक्षा एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के नए ढांचे और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई जैसी तकनीक ने पढ़ाई के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है। शिक्षा का उद्देश्य अब केवल किताबी ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों को भविष्य की चुनौतियों के लिए मानसिक रूप से तैयार करना भी है। इसी संदर्भ में जालंधर के प्रमुख शिक्षाविदों ने अपने अनुभव साझा किए हैं ताकि बच्चों, शिक्षकों और अभिभावकों के बीच एक बेहतर तालमेल बन सके और शिक्षा को और अधिक प्रभावी बनाया जा सके। बुधवार को दैनिक भास्कर के जालंधर सिटी ऑफिस में ग्रुप डिस्कशन में विभिन्न स्कूलों के प्रिंसिपल व प्रबंधक शामिल हुए और आज के दौर में पढ़ाई में एआई के इस्तेमाल के अहम पहलूओं पर चर्चा की। तकनीक और मेहनत के बीच सही संतुलन बनाना सिखाना जरूरी सेठ हुकम चंद स्कूल के प्रिंसिपल ममता बहल कहती हैं कि विषयों का मेल बनाना एक बड़ी चुनौती है। यदि कोई बच्चा केमिस्ट्री के साथ डांस जैसा विषय चुनता है, तो उसे भविष्य में कॉलेज की पढ़ाई के दौरान मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। वे इस बात को लेकर भी चिंतित हैं कि सीबीएसई का पैटर्न आसान होने से बच्चों को आगे चलकर कोर साइंस जैसे कठिन विषयों को समझने में समस्या आ सकती है। उनके अनुसार बच्चे एआई पर बहुत ज्यादा निर्भर हो रहे हैं, इसलिए उन्हें तकनीक और मेहनत के बीच सही संतुलन बनाना सिखाना जरूरी है। डॉ. राजेश चंदेल, जो कि एपीजे स्कूल टांडा रोड के प्रिंसिपल हैं, उनका कहना है कि नई शिक्षा नीति के तहत 5+3+3+4 के ढांचे में अलग-अलग विषयों को एक साथ जोड़ना एक अच्छा कदम है। अब बच्चे अपनी पसंद के अनुसार फिजिक्स के साथ साइकोलॉजी जैसे विषय भी पढ़ सकते हैं। हालांकि वे इस बात पर जोर देते हैं कि बच्चों को करियर के मामले में स्पष्ट होना चाहिए क्योंकि ज्यादा विकल्प कभी-कभी भ्रम पैदा कर सकते हैं। उनका यह भी मानना है कि बच्चों को डिजिटल साक्षरता सिखानी चाहिए और माता-पिता को खुद बच्चों के सामने तकनीक का सही इस्तेमाल करके एक मिसाल पेश करनी चाहिए। बच्चों को समझाना होगा कि एआई का कंटेंट गलत भी हो सकता है सेठ हुकम चंद स्कूल की ही शिक्षिका शिखा का मानना है कि सीबीएसई का एआई सिलेबस अभी काफी हद तक थ्योरी पर आधारित है। बच्चे एआई को इसलिए चुनते हैं क्योंकि वे रोबोट जैसी चीजें बनाना सीखना चाहते हैं। वे कहती हैं कि हमें बच्चों को यह समझाना होगा कि एआई एक मशीन है और उसका कंटेंट गलत भी हो सकता है। बच्चों में खुद सोचने और सही-गलत की पहचान करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए ताकि मशीन उन पर हावी न हो जाए। साथ ही वे पेरेंट्स को सलाह देती हैं कि वे अपने सपने बच्चों पर न थोपें। रविंदर खुल्लर मेमोरियल स्कूल के प्रिंसिपल अबकार सिंह कहते हैं कि बच्चों को एआई का सही इस्तेमाल सिखाना बहुत जरूरी है, वरना यह भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है। आज चुनौती यह है कि बच्चे क्लास में पढ़ने से पहले ही इंटरनेट से जानकारी जुटा लेते हैं और फिर उसे क्रॉस-चेक करते हैं। हमें बच्चों को समझाना होगा कि वे मशीन के गुलाम न बनें बल्कि अपनी रचनात्मक सोच से तकनीक को और बेहतर बनाएं। सूचनाओं की इस बाढ़ ने छात्रों में यह भ्रम पैदा कर दिया है कि स्क्रीन पर दिखने वाली हर बात पूरी तरह सही है। इंटरनेट पढ़कर बच्चे टीचर्स को टोकने लगे हैं फोकस ग्रुप चर्चा में एक बड़ी चुनौती यह सामने आई कि आजकल के छात्र शिक्षकों के ज्ञान से ज्यादा इंटरनेट और एआई पर भरोसा करने लगे हैं। कक्षा में पढ़ाते समय अक्सर ऐसी स्थिति पैदा होती है जब छात्र शिक्षक की बात को बीच में ही टोक देते हैं और तर्क देते हैं कि इंटरनेट पर तो कुछ और ही जानकारी दी गई है। शिक्षकों का मानना है कि इससे गुरु और शिष्य के बीच का वह गहरा विश्वास कम हो रहा है जो सीखने का मुख्य आधार होता है। अब सबसे बड़ी चुनौती छात्रों को यह समझाने की है कि तकनीक केवल एक सहायक साधन है, वह किसी अनुभवी शिक्षक के मार्गदर्शन और मानवीय समझ की जगह कभी नहीं ले सकती। शिक्षक ही छात्र को सही दिशा दिखा सकते हैं। दर्शन एकेडमी की कोऑर्डिनेटर सोनिया साहनी का कहना है कि स्कूलों में स्मार्ट बोर्ड लगने से बच्चों की पढ़ाई में रुचि बढ़ी है और वे कठिन बातों को आसानी से समझ लेते हैं। वे सुझाव देती हैं कि अब शिक्षकों, अभिभावकों और बच्चों के लिए एआई से जुड़ी वर्कशॉप होनी चाहिए ताकि वे इसके बारे में विस्तार से जान सकें। पढ़ाई के लगातार दबाव को कम करने के लिए वे स्कूलों में खुशी और मनोरंजन वाले पीरियड यानी जॉयफुल पीरियड्स की वकालत करती हैं ताकि बच्चे तनावमुक्त होकर सीख सकें। फॉक्स ग्रुप डिस्क्शन के दौरान एक्सपर्ट्स ने एआई के प्रभाव और कमियों के बारे में खुलकर चर्चा की।

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