दैनिक भास्कर की ‘राजस्थानी जायका’ सीरीज में आज बात उन फ्लेवर की, जो पंजाब की गलियों से जयपुर पहुंचा। ये है ‘कुलचा किंग’ और ‘पराठा सिंह’। पंजाब के स्वाद में राजस्थानी तड़का के साथ अमृतसरी कुलचे, पंजाबी पराठे और पेड़े वाली लस्सी ने लोगों का दिल जीत लिया है। खासतौर पर चूर चूर नान, जिसे दाल मखनी और रायता के साथ परोसा जाता है, यहां के मेन्यू की जान है। खाने के साथ सर्व की जाने वाली इमली की चटनी भी काफी लोकप्रिय है, जिसे कच्चे प्याज के साथ परोसा जाता है। यह न केवल स्वादिष्ट है बल्कि पाचन में भी मददगार मानी जाती है। क्या है इन जायकों में खास, चलिए आपको भी रू-ब-रू करवाते हैं… दो भाइयों का सपना, अमृतसरी जायके की शुरुआत जयपुर के शिप्रा पथ, मानसरोवर में ‘कुलचा किंग-पराठा सिंह’ फूड आउटलेट की शुरुआत जयपुर के हिमांशु त्रिवेदी और मोहित त्रिवेदी ने की है। दोनों भाई हैं और एक साथ होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई कर चुके हैं। कई साल 5-स्टार होटलों में काम करने के बाद इस बिजनेस की शुरुआत की। हिमांशु त्रिवेदी ने होटल इंडस्ट्री में 17 साल का अनुभव लिया। उनके छोटे भाई मोहित त्रिवेदी ने 12 साल जायकों की दुनिया को जाना। दोनों भाइयों ने अपने इस बिजनेस को पंजाबी फ्लेवर देने के लिए खास नाम ‘कुलचा किंग’ और ‘पराठा सिंह’ रखा। ओरिजिनल टेस्ट के लिए अमृतसर में लिया अनुभव हिमांशु त्रिवेदी ने बताया कि 5-स्टार होटलों में शानदार एंबियंस और हाई-स्टैंडर्ड सर्विस तो होती है, लेकिन खाने का असली पंजाबी स्वाद कहीं न कहीं मिसिंग रहता है। टेस्ट को ऑथेंटिक बनाने के लिए उन्होंने 2016 से 2018 तक अमृतसर में रहकर वहां के कुलचे, पराठे, नान और लस्सी की असली रेसिपी को सीखा। दिल्ली से लाते हैं खास मसाले पंजाबी खाने में मसालों का अहम रोल होता है, इसलिए कुलचा किंग और पराठा सिंह में इस्तेमाल होने वाले मसाले जयपुर के बजाय दिल्ली के चावड़ी बाजार से मंगाए जाते हैं। हिमांशु बताते हैं कि राजस्थान के मसाले अपने स्वाद के लिए मशहूर हैं, लेकिन अमृतसरी कुलचे और पंजाबी खाने के लिए चावड़ी बाजार के मसाले ज्यादा उपयुक्त साबित हुए। इसके लिए वहीं के एक वेंडर को फिक्स किया है, जिससे रेगुलर सप्लाई मिलती है। पानी बढ़ाता है स्वाद खाने के स्वाद में पानी की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है। हिमांशु के अनुसार, किसी भी खाने के असली जायके के लिए वहां का पानी भी अहम होता है। इसी कारण उन्होंने अपनी रेसिपी को खास तरीके से तैयार किया है, ताकि खाने में वही असली अमृतसरी स्वाद बरकरार रहे। हिमांशु ने बताया छोटा भाई मोहित हेड शेफ है। एक-एक आइटम को खुद अपनी देखरेख में तैयार करवाते हैं। मसाले से लेकर कितने समय तक पकाना है, इसका खास ध्यान रखा जाता है। अमृतसर में स्ट्रीट ढाबों पर काम कर सीखा शेफ मोहित ने बताया जयपुर में जब भी छोले कुलचे को लेकर खाने जाते थे। लेकिन पंजाब की गलियों वाला स्वाद नहीं मिलता था। ऐसे में हम दोनों भाई अमृतसर गए वहां स्ट्रीट ढाबों पर काम किया। वहां काम करने के बाद अमृतसर के असली छोले कुलचे पराठे, पेड़े वाली लस्सी का ऑथेंटिक रेसिपी बनानी सीखी। जयपुर आकर वैसा ही स्वाद बनाना शुरू किया। मोहित ने बताया कि कुलचे को इसकी लेयरिंग ही स्पेशल बनाती है। कुलचे को क्रंची बनाने के लिए इसे 8 से 10 लेयर में घी लगाकर तैयार करते हैं। खुद से तैयार सीक्रेट मसाले लगाए जाते है। जब इसे बटर के साथ सर्व करते हैं तो इसका टेस्ट और बेहतर होता है। आगे बढ़ने से पहले देते चलिए आसान से सवाल का जवाब पेड़े वाली लस्सी की खासियत शेफ मोहित ने बताया कि पेड़े की लस्सी अमृतसर की पॉपुलर है। अधिकतर पंजाबी घरों में छोले कुलचे के साथ इसे सर्व किया जाता है। इसलिए हमने भी छोले कुलचे के साथ पेड़े वाली लस्सी को सर्व करना शुरू किया। अमृतसर में छोले कुलचे के साथ प्याज वाली इमली की चटनी सर्व करते हैं। हमने भी इसे तैयार किया इसमें गुड और इमली के साथ कई अन्य मसाले मिलाकर तैयार करते हैं। जिससे इसका टेस्ट बेहतर हो जाता है। एक प्लेट में 1 कुलचा, छोला, इमली की चटनी, अचार और बटर के साथ लस्सी सर्व करते हैं। इसकी क्वांटिटी इतनी होती है कि इसे खाने के बाद 12 घंटे तक कुछ भी खाने की जरूरत नहीं पड़ती। नाम रखने के पीछे भी रोचक कहानी हिमांशु ने बताया नाम के पीछे की कहानी बताई कि कुलचे किंग फूड है, यह मेन्यू का मैन फूड है, इसलिए हमने ‘कुलचा किंग’ नाम रखा। रेस्टोरेंट में पंजाबी फूड सर्व कर रहे हैं लेकिन पंजाबी फूड बिना पराठे के अधूरा है, इसलिए हमने इसमें ‘पराठा सिंह’ नाम एड किया। हम दोनों भाई इसे रन कर रहे हैं, इसलिए दोनों को डिनोट करने के लिए ‘कुलचा किंग-पराठा सिंह’ नाम रखा। कस्टमर वैभव ने बताया मैं यहां आता रहता हूं क्योंकि मुझे पंजाबी फूड काफी पसंद है। यहां पंजाब का रियल टेस्ट मिलता है। ऐसे में 2 – 5 दिन में यहां आ कर अपनी फेवरेट डिश छोले कुलचे के साथ पेड़े वाली लस्सी का लुत्फ लेता हूं। पिछले राजस्थानी जायका में पूछे गए प्रश्न का सही उत्तर ये हैं जयपुर के महाराज के पेड़े। आपने मथुरा के पेड़े तो खूब खाए होंगे लेकिन जयपुर की एक 50 साल पुरानी छोटी सी दुकान डबल सिकाई वाले महाराज के पेड़े बेहद खास हैं। इन पेड़ों का स्वाद चिड़ावा और मथुरा के पेड़ों से बिल्कुल जुदा है। जयपुर से लेकर अमेरिका तक डिमांड होती है। इन पेड़ों की शुरुआत की कहानी बड़ी दिलचस्प है…(CLICK कर पढ़ें)


