प्रदेश के सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों के लिए 20 हजार करोड़ रु. की जरूरत के बावजूद राज्य के बजट में नाममात्र का प्रावधान करने पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताई है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार अन्य कामों के टेंडर जारी कर रही है, लेकिन स्कूलों के लिए पैसा नहीं दे रही। क्या स्वास्थ्य सेवाओं को छोड़कर अगले एक साल के लिए अन्य कामों के टेंडर जारी करने पर रोक लगा दें। जस्टिस सुदेश बंसल व जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ ने यह आदेश झालावाड़ में हुए स्कूल हादसे के बाद लिए स्वप्रेरित प्रसंज्ञान मामले में सुनवाई करते हुए दिया। खंडपीठ ने कहा कि एक कमेटी बनाएंगे, जो इस काम को मॉनिटर करेगी। कमेटी में कौन-कौन शामिल हो और अतिरिक्त फंड की व्यवस्था किस तरह से की जाए। इसके लिए सभी पक्षों से सुझाव मांगे हैं। कोर्ट- यह ऊंट के मुंह में जीरा एजी राजेन्द्र प्रसाद ने खंडपीठ को बताया कि बजट में स्कूलों की मरम्मत के लिए 550 करोड़ और नए भवनों के लिए 450 करोड़ का प्रावधान किया है। लैब्स के लिए 200 करोड़ दिए हैं। इस पर खंडपीठ ने कहा कि पिछली सुनवाई में स्कूलों के लिए 20 हजार करोड़ की जरूरत बताई थी। ऐसे में यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। अदालत ने कहा कि यह देखें कि स्कूलों के लिए डोनेशन, भामाशाह योजना, एमपी-एमएलए फंड का इसके लिए किस तरह उपयोग हो सकता है। मंदिरों में 600 करोड़ रुपए दान के आ सकते हैं तो शिक्षा का दान भी बड़ा दान है।


