छत्तीसगढ़ में जलजीवन मिशन का काम निर्धारित समय से काफी देर से चल रहा है। इसकी मुख्य वजह तत्कालीन सरकार की ओर से अनावश्यक देर से काम शुरू करना है। छत्तीसगढ़ में इस योजना के लॉन्च होने के दो साल बाद काम शुरू हुआ। और उसके दो साल बाद ट्यूबवेल का टेंडर हुआ। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ में जलजीवन मिशन ज्यादातर स्थानों पर अधूरा है। विभाग के दावों में ही कई जगह विरोधाभास है। जिन गांवों में काम पूरा होने का दावा किया जा रहा है, वहां भी पानी नहीं पहुंच पाया है। 2024 में पूरा करने का लक्ष्य बढ़ाकर 2028 कर दिया गया है। इस तरह योजना का चार साल लेट होना तय है। छत्तीसगढ़ के 19 हजार 656 गांवों के 50 लाख परिवारों को नल जल उपलब्ध कराए जाने का लक्ष्य है। विभाग का दावा है कि 40 लाख 40 हजार घरों में नल कनेक्शन लगाया जा चुका है। अभी 9 लाख 61 हजार घरों में नल कनेक्शन लगना बाकी है। जल जीवन मिशन को पीएम नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2019 को लॉन्च किया था। इस पर तत्काल काम शुरू होना था, लेकिन छत्तीसगढ़ में 2021 में शुरू हुआ। इसके तहत टंकी निर्माण और नल लगाने की प्रक्रिया शुरू की गई। लेकिन पानी का इंतजाम किया ही नहीं गया। टेंडर विवाद के चलते ट्यूबवेल का टेंडर अप्रैल 2023 में किया गया। इसीलिए कई गांवों में टंकी तो बनीं, नल कनेक्शन हुए, लेकिन पानी नहीं आ रहा है। जल जीवन मिशन के तहत 18 हजार 308 नलकूप का खनन होना है, लेकिन अब तक केवल 10 हजार नलकूप का खनन हो पाया है। इस योजना में 26 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान है, पर अभी 15 हजार करोड़ रुपए ही खर्च हो पाए हैं। छत्तीसगढ़ में 55% के आसपास ही काम हो पाया है। विभाग का दावा- काम पूरा, हकीकत- कहीं नल लगे, पर पानी नहीं बिलासपुर के बगधरा गांव में टंकी तो बन गई, पर घरों के नल में पानी न आने से लोग 5 किमी दूर से गड्ढे का गंदा पानी लाने को मजबूर हैं। फोटो- शेखर गुप्ता 2028 तक बढ़ाई गई समय सीमा, बजट 26 हजार करोड़ रुपए का, खर्च हो सके 15 हजार करोड़ 15 एजेंसी अब तक डी बार
योजना 2024 में पूरी होनी थी, लेकिन समय पर काम न होने से इसे 2028 तक पूरा करने का लक्ष्य दिया है। योजना के क्रियान्वयन में देर करने वाले विभिन्न ठेकेदारों पर अब तक 53 करोड़ 24 लाख रुपए अर्थदंड लगाया जा चुका है। वहीं 15 निर्माण एजेंसियों को डी बार किया जा चुका है। हुआ था बड़ा विवाद
कांग्रेस सरकार के समय योजना के टेंडर को लेकर काफी विवाद हो चुका है। तत्कालीन पीएचई मंत्री रुद्र कुमार गुुरु ने 10 हजार करोड़ का टेंडर निकाला था। उस समय मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने मंत्री के फैसले को पलटते हुए टेंडर निरस्त किया था। कांग्रेस सरकार ने रुचि नहीं ली
पीएचई मंत्री और उपमुख्यमंत्री अरुण साव ने कहा कि केंद्र सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना के क्रियान्वयन में कांग्रेस की तत्कालीन राज्य सरकार ने रुचि नहीं ली। कांग्रेस सरकार की लापरवाही का खामियाजा राज्य के लोगों को भुगतना पड़ रहा है। अब इस योजना के काम में तेजी लाई गई है।


