जेएनएनयूआरएम प्रोजेक्ट का हश्र देखिए:1500 करोड़ खर्च, 10 साल में ही खंडहर हो गए गरीबों के फ्लैट

जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन (जेएनएनयूआरएम) के तहत 2009 में शहर में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आवास योजना लाई गई। इसके तहत करीब 5 हजार आवासीय इकाइयां बनाई गईं। वर्ष 2015 में लोगों को इन फ्लैट्स में शिफ्ट कर दिया गया, लेकिन रखरखाव नहीं होने से महज 10 वर्ष में ही ये मल्टियां जर्जर होकर डिसमेंटल की स्थिति में पहुंच गई हैं। भूरी टेकरी पर बनी मल्टी तो अब खंडहर जैसी नजर आ रही। ज्यादातर फ्लैट्स खाली हैं, जबकि कुछ में रह रहे लोग बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं। निगम की बैठकों में कई बार इन इमारतों को गिराकर नया प्रोजेक्ट शुरू करने पर चर्चा हो चुकी है। जेएनएनयूआरएम की यह योजना 1500 करोड़ रुपए से अधिक लागत की थी। गोम्मटगिरि : प्लास्टर उखड़ा, खिड़की दरवाजे टूटे, पीने का पानी भी गंदा गोम्मटगिरि में नगर निगम ने जेएनएनयूआरएम के तहत 14 बिल्डिंगें बनाई थीं। वहां रहने वाले उत्तम जाधव ने बताया मात्र चार साल में ही इनकी हालत खराब होने लगी थीं। अब 10 साल में पूरी बिल्डिंग खंडहर बन चुकी। दीवारें काली पड़ गईं। प्लास्टर उखड़ गया। लिफ्ट की सुविधा तो कभी रही ही नहीं। बुजुर्गों को ऊपर-नीचे आने-जाने में दिक्कत होती है। कई लोग गिरकर घायल हो चुके। खिड़कियां-दरवाजे टूट चुके। पानी गंदा आता है। एक कॉलोनाइजर ने दीवार बना दी, जिससे जलजमाव की समस्या खड़ी हो गई। हमने सीएम हेल्पलाइन से लेकर निगम तक हर जगह गुहार लगाई, लेकिन कुछ नहीं हुआ। लखन तायड़े का कहना है कि यहां अब रहने लायक स्थिति नहीं है। ड्रेनेज लाइन नहीं है। पीने का पानी नहीं मिलता। सीढ़ियां टूट चुकी। ऊपर-नीचे आते-जाते हादसे का डर रहता है। चार साल से शिकायत कर रहे, लेकिन सुनवाई नहीं होती। भूरी टेकरी में बने फ्लैट्स को डिसमेंटल करने का प्रस्ताव था तैयार अफसरों का कहना है कि जेएनएनयूआरएम के तहत 2010 से 2015 के बीच तैयार भूरी टेकरी वाली बिल्डिंग की स्थिति बहुत खराब है। उसे डिसमेंटल करने का प्रस्ताव तैयार हुआ था लेकिन अभी फैसला नहीं हुआ है। उस समय जब यह फ्लैट बने थे, तब वहां लोगों को बिना पैसा लिए शिफ्ट किया था। सिर्फ 10 से 20 फीसदी लोगों ने 3 हजार रुपए की रसीद कटवाई थी। 80 फीसदी से ज्यादा लोगों ने कोई राशि नहीं दी। कुछ लोग दरवाजे-खिड़कियां चुराकर ले गए। अपने फ्लैट किराए पर देकर दूसरी जगह चले गए। इसीलिए भूरी टेकरी वाले प्रोजेक्ट को डिसमेंटल कर दोबारा बनाने का प्रस्ताव बना था। भास्कर एक्सपर्ट – अतुल शेठ, आर्किटेक्ट 50 साल वाली इमारतें भी मजबूत, ये गंभीर मामला, जांच हो इंदौर में रेसीडेंसी के 100 साल पुराने घर हों या शहर में बनी 50 साल पुरानी इमारतें। इतनी बुरी स्थिति तो इनकी भी नहीं है, जैसे ये जेएनएनयूआरएम के आवास हो गए। इसमें केंद्र, राज्य और निगम सभी का पैसा लगा है। जनता के धन से बनी इमारत अगर 10 साल में ही जर्जर हो गई तो फिर ये मामला गुणवत्ता से समझौते और आर्थिक गड़बड़ियों से जुड़ा हो सकता है। सिविल वर्क औसत दर्जे का भी हो तो कम से 15-20 साल वह ठीक-ठाक अवस्था में रहता है। ये तो बेहद खराब गुणवत्ता से किया हुआ काम है। इसकी जांच करके दोषियों के चेहरे सामने लाना चाहिए।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *