जैसलमेर में दो युवतियों ने ली दीक्षा, बनीं साध्वी:कहा- मैं अपनी आत्मा की रानी बनने जा रही हूं; शहर ​में निकाली शोभायात्रा

जैसलमेर में शुक्रवार को दो युवतियों ने सांसारिक जीवन त्याग संयम पथ अपनाया और जैन साध्वी बनीं। गच्छाधिपति आचार्य श्री जिन मणिप्रभ सुरीश्वरजी म.सा. आदि ठाणा के पावन सान्निध्य में आयोजित इस महोत्सव में भक्ति, वैराग्य और समर्पण का अनूठा संगम देखने को मिला। संयम पथ ग्रहण करने वाली 28 साल की संतोष मालू (अब संकल्पप्रज्ञा श्री जी म.सा.) ने कहा- मैं अपने आत्मा की रानी बनने जा रही हूं। इससे पूर्व शहर में दोनों मुमुक्षुओं का वरघोड़ा निकाला गया। ‘दासी नहीं, रानी बनने जा रही हूं’: संकल्पप्रज्ञा श्री जी दीक्षा ग्रहण करने वाली 28 वर्षीय संतोष मालू (अब संकल्पप्रज्ञा श्री जी म.सा.) की कहानी आधुनिक युवाओं के लिए प्रेरणा है। वाणिज्य (कॉमर्स) में उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद उनका मन कभी भौतिक चकाचौंध में नहीं रमा। कोरोना काल की विभीषिका और जीवन की अनिश्चितता ने उनके भीतर वैराग्य के बीज बोए। दीक्षा से पूर्व उन्होंने भरे गले से कहा, “लोग समझते हैं कि मैं संसार छोड़कर दासी बनने जा रही हूं, लेकिन सच यह है कि मैं अपनी आत्मा की रानी बनने जा रही हूं।” दीक्षा के दौरान उन्होंने सत्य, अहिंसा, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जैसे पंच महाव्रतों को धारण किया। लोककल्याण का मार्ग चुना: समर्पणप्रज्ञा श्री जी वहीं, मेना लूणिया (अब समर्पणप्रज्ञा श्री जी म.सा.) ने आत्मकल्याण से लोककल्याण की ओर कदम बढ़ाए हैं। आगमों के गहन अध्ययन और सत्संग के प्रति उनकी रुचि ने उन्हें साधना के पथ पर अग्रसर किया। दीक्षा के अंतिम चरणों में जब ‘केशलोचन’ (बालों का त्याग) और वेश परिवर्तन की विधि हुई, तो हजारों श्रद्धालुओं की आंखें नम हो गईं, लेकिन चेहरों पर धर्म-गौरव की चमक थी। जैसलमेर की सड़कों पर उमड़ा श्रद्धा का ज्वार दीक्षा विधि से पूर्व दोनों मुमुक्षुओं की एक भव्य शोभायात्रा निकाली गई। सजे-धजे हाथियों, घोड़ों और बैंड-बाजों के साथ निकली इस यात्रा में जैसलमेर के नागरिकों ने पुष्पवर्षा कर अभिनंदन किया। परिवारजनों ने अश्रुपूर्ण नेत्रों के साथ अपनी लाड़लियों को संयम पथ पर विदा किया। पूरा वातावरण ‘दीक्षार्थी अमर रहे’ और ‘गुरुदेव के जयकारों’ से गुंजायमान रहा। 6 से 8 मार्च तक आध्यात्मिक उत्सव की धूम चादर महोत्सव आयोजन समिति के सचिव पदम टाटिया ने बताया- यह दीक्षा महोत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आधुनिक समाज के लिए एक संदेश है कि सुख सुविधाओं के बीच भी आत्मिक शांति का मार्ग श्रेष्ठ है। जैसलमेर की इस धरा से उठी वैराग्य की यह लहर समूचे भारत में आध्यात्मिक चेतना का संचार करेगी। दीक्षा के साथ ही जैसलमेर अब चादर महोत्सव और विश्वव्यापी दादागुरु इकतीसा पाठ के लिए तैयार है। 7 मार्च को एक करोड़ आठ लाख श्रद्धालु विश्वभर में सामूहिक दादागुरु इकतीसा का पाठ करेंगे।

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