धमतरी जिले के कुरूद ब्लॉक के भुसरेंगा निवासी युवा किसान हर्षवर्धन चंद्राकर ने 39 वर्ष की उम्र में ही कृषि के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बना ली है। सरकारी नौकरी की बजाय उन्होंने अपनी 4 एकड़ जमीन पर 2013 में सब्जी फसलों की खेती शुरू की और करीब 13 वर्षों की मेहनत के बाद आज वे 70 एकड़ जमीन पर टमाटर, मिर्च, खीरा और लौकी जैसी सब्जी फसलों की खेती कर रहे हैं। वे भुसरेंगा, बगौद, कन्हारपुरी, मरौद, बगदेही और भेंडरवानी जैसे गांवों के लगभग 150 लोगों को रोजगार दे रहे हैं। हर्षवर्धन बताते हैं कि उन्होंने 2010 में रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय से एमएससी एग्रीकल्चर की पढ़ाई पूरी की और सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया। हालांकि, एग्रीकल्चरल एक्सटेंशन ऑफिसर (एईओ रूरल) के पद की नौकरी मिलने के बाद भी उन्होंने ज्वाइनिंग नहीं ली। उन्होंने नौकरी की बजाय खेती का रास्ता चुना और खेती में भी सब्जी फसलों की खेती के रास्ते में आगे बढ़े। उनकी सालाना सब्जी उत्पादन 130 से 150 टन तक है, जिसे छत्तीसगढ़ सहित पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, उत्तरप्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड और राजस्थान जैसे 9 राज्यों में सप्लाई करते हैं। खेती में नवाचार लाते हुए उन्होंने अपनी 70 एकड़ की भूमि पर 15 लाख रुपए की लागत से ऑटोमेशन सिस्टम लगाया है, जिससे ड्रिप सिंचाई के जरिए पानी की बचत हो रही है। इसके अलावा हर्षवर्धन ने पिछले 2 वर्षों से 3 एकड़ जमीन पर फूलों की खेती भी शुरू की है। पुणे से मंगाए गए गुलाब, जरबेरा के पौधों की मदद से वह इस क्षेत्र में भी अपनी पहचान बना रहे हैं। उनकी फूलों की डिमांड छत्तीसगढ़ के अलावा ओडिशा, मध्यप्रदेश तक पहुंच चुकी है। सरकार ने हर्षवर्धन को उनकी उपलब्धियों के लिए उन्नत कृषक पुरस्कार दिया है। साथ ही उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर विलेज इंटरप्रेन्योर के पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया है। हर्षवर्धन बताते हैं कि पढ़ाई के दौरान उनके पिता सतीश चंद्राकर धान की खेती करते थे। काफी मेहनत करने पर प्रति एकड़ 25 से 30 हजार रुपए का ही मुनाफा हो जाता था। अपनी पढ़ाई और कृषि में रुचि को ध्यान में रखते हुए उन्होंने 4 एकड़ जमीन में सब्जी की खेती शुरू की। सबसे पहले बैंगन की सब्जी लगाई। इसमें मेहनत तो करनी पड़ी, लेकिन मुनाफा 1 लाख तक हुआ। उन्होंने इस सफलता पर अपने पिता से चर्चा कीा। धीरे-धीरे धान की खेती को कम कर सब्जी की खेती पर ध्यान केंद्रित किया गया। अब उनके 70 एकड़ के खेत में केवल 8-10 एकड़ में धान की खेती होती है, जबकि बाकी क्षेत्र में सब्जी उगाई जा रही है। उनका मुख्य उद्देश्य है कि रसायनिक दवाइयों का इस्तेमाल कम से कम किया जाए। इसके लिए उन्होंने गोबर की खाद और वर्मी कंपोस्ट का अधिक से अधिक उपयोग शुरू किया है। वे 5 टैंकों में गोबर और केचुएं की मदद से सालभर में 20 टन से अधिक वर्मी कंपोस्ट खाद का उत्पादन कर रहे हैं। खाद का उपयोग कर फसलों को कीट, बीमारियों से सुरक्षित रखते हुए अपनी खेती को आगे बढ़ा रहे हैं। साथ ही उन्होंने यह तय किया कि सब्जियों में ऐसे रसायनों का उपयोग हो, जो स्वास्थ्य को नुकसान न पहुंचाएं।
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