बिहार और तेलंगाना के बाद झारखंड में भी जातीय सर्वे होगा। कांग्रेस विधायक प्रदीप यादव के सवाल के जवाब में राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री दीपक बिरुआ ने विधानसभा में बताया, ‘जातीय सर्वे कराने को लेकर सरकार प्रतिबद्ध है। अगले वित्तीय वर्ष (2025-26) में यह काम होगा।’ उनका कहना है कि कार्मिक विभाग इस पर काम कर रहा है। वित्तीय प्रबंधन सहित कई चीजों को देखा जा रहा है। कुछ निजी एजेंसी से बात भी हुई है। हालांकि, भास्कर सूत्रों के अनुसार, झारखंड में जातीय सर्वे की बात अभी सिर्फ कागजों में ही है। सरकार ने कोई विशेष पहल नहीं की है। इसके पीछे हेमंत सोरेन की राजनीति को कारण माना जा रहा है। इस स्पेशल स्टोरी में पढ़िए और देखिए, आखिर राज्य में जातीय सर्वे की लेटलतीफी के पीछे क्या कारण है? 17 फरवरी 2024 को कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद सरकार ने अब तक क्या किया? अगर जातीय सर्वे होगा तो क्या असर पड़ेगा? सबसे पहले जानिए, कहां से आई जातीय सर्वेक्षण की बात दरअसल, झारखंड में जातीय सर्वे की बात चुनाव से ठीक पहले की है। प्रदेश में यह कांग्रेस की देन है। विधानसभा चुनाव से ठीक पहले झारखंड में इंडिया गंठबंधन ने संयुक्त घोषणापत्र जारी की थी। इस घोषणा पत्र में राज्य में जातीय सर्वे कराने की बात कही थी। हालांकि जेएमएम की ओर से जारी घोषणापत्र में इसका उल्लेख नहीं था। जातीय सर्वे की बात झारखंड में कभी रही भी नहीं है। राज्य में कांग्रेस सत्ता में है और कांग्रेस के आलाकमान राहुल गांधी देशभर में जातीय सर्वे कराने की बात कर रहे थे तब राज्य में चुनाव को देखते हुए इसे मुद्दा बनाया गया। जिसका इंडिया गठबंधन की अन्य पार्टियों ने समर्थन किया। झारखंड में जातीय सर्वे इस तरह आया। अगर झारखंड में जातीय सर्वेक्षण हो जाता है तो ऐसा करने वाला देश में यह चौथा राज्य होगा। इससे पहले बिहार, कर्नाटक और तेलंगाना में जातीय सर्वे हो चुका है। जातीय सर्वेक्षण और राज्य सरकार जातीय सर्वेक्षण की बात और राज्य सरकार के अब तक के उठाए गए कदम पर पॉलिटिकल विशेषज्ञों की राय मिलती जुलती है। राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि जातीय सर्वे महज मुद्दा भर है। इसके लिए जितना कांग्रेस आतुर है, जेएमएम उतना ही निष्क्रिय है। विशेषज्ञों की मानें तो इस जातीय सर्वे से कांग्रेस को कितना फायदा होगा यह तो पता नहीं पर जेएमएम को दूरगामी नुकसान जरूर हो जाएगा। सदन में नए वित्तीय वर्ष में सर्वे कराने की बात जरूर कह रही है पर यह नहीं बता पा रही है कि यह सर्वे कब से और कैसे कराया जाएगा। सर्वे के प्रति सरकार के रवैये को देखते हुए एक्सपर्ट मानते हैं कि समय-समय पर यह विषय उठता जरूर रहेगा, पर इसके पूरा होने की संभावना नहीं के बराबर है। कांग्रेस जल्दबाजी में क्यों ? फिर दबाव क्यों नहीं बना रहा सीनियर जर्नलिस्ट विनोद ओझा कहते हैं जातिगत सर्वे या गणना को लेकर जितनी जल्दबाजी कांग्रेस को है उतना जेएमएम को नहीं है। कांग्रेस को जल्दबाजी इस बात की है कि इनके आलाकमान देशभर में घूम-घूम कर जातीय गणना और आरक्षण की 50 फीसदी दीवार तोड़ने की बात कर रहे हैं। उनका कहना है कि जितना हिस्सेदारी उतनी भागीदारी होगी। यही वजह है कि यहां कांग्रेस को जल्दबाजी है। हांलाकि वह यह भी कहते हैं कि जल्दबाजी कांग्रेस को जरूर है पर उनकी क्षमता ऐसी नहीं है कि वह सरकार या जेएमएम पर प्रेशर बना सके। इसके पीछे की वजह यह भी है कि पार्टी इस बात को अच्छे से जानती है कि हाल में हुआ विधानसभा चुनाव में उसकी जो जीत हुई है उसके पीछे जेएमएम और हेमंत के समर्थन के साथ मंईयां सम्मान जैसी योजना है। कांग्रेस केवल अपने बूते चुनाव नहीं जीती है। कांग्रेस को आलाकमान के आदेश की मजबूरी विनोद ओझा कहते हैं कि जातीय सर्वे को लेकर कांग्रेस के पास एक तो आलाकमान के आदेश की मजबूरी है और दूसरा वह खुद चाहती है। यह दिखाने के लिए भी कि वह आलाकमान के मुद्दे को उठाए हुए है। वहीं आप दूसरी ओर जेएमएम को देखेंगे तो उसके साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं है। ऐसा इसलिए भी जेएमएम के साथ अल्पसंख्यक, आदिवासी सहित अन्य समुदायों के मत का समर्थन है। अगर सर्वे होता है तो इससे कई चीजें स्पष्ट हो जाएंगी। ऐसे में संभावना बनती है कि जेएमएम को उस आधार पर नुकसान हो जाए। यही वजह है कि जेएमएम को इसे लेकर कोई जल्दबाजी नहीं है। सरकार वाकई इस सर्वे को कराना चाहती है? इस सवाल पर वह कहते हैं कि यह निर्भर करता है कि कांग्रेस कितना दबाव बना पाती है। तमाम राजनीतिक परिदृश्यों को देखें तो स्पष्ट नजर आता है कि अगर राज्य में जातीय सर्वे कराना है तो कांग्रेस को आलाकमान स्तर से दबाव बनाना होगा। राज्य में जातीय सर्वे महज मुद्दा, कांग्रेस को भी विशेष फायदा नहीं सीनियर जर्नलिस्ट आनंद कुमार कहते हैं कि झारखंड की राजनीति उन राज्यों से अलग है जहां जातीय सर्वे हो चुके हैं। कांग्रेस राज्य में सर्वे की बात इसलिए कह रही है कि क्योंकि यह राहुल गांधी का मुद्दा है। राहुल गांधी को खुद नहीं पता है कि जातीय सर्वे करा कर फायदा क्या होगा। कभी ओबीसी कांग्रेस का परंपरागत वोटर हुआ करता था जो अब रहा नहीं। अलग-अलग राज्यों में इनका बंटवारा हो गया है। जातीय सर्वे महज एक मुद्दा भर में है। वह कहते हैं कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद अब हेमंत सोरेन इस मुद्दे पर बहुत आतुर दिखाई नहीं दे रही है। जेएमएम के रुख से समझें, कांग्रेस का फायदा वह कहते हैं कि सदन में कांग्रेस के विधायक इस मुद्दे को उठा रहे हैं। अब सवाल है कि कांग्रेस को इससे क्या फायदा होने जा रहा है। वह बताते हैं कि जेएमएम के रुख को समझा जा सकता है। पार्टी आदिवासी और मुसलमानों के साथ झारखंड की क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति पर जोर देती है। इसमें सभी मूलवासी खतियान धारी जातियां शामिल हैं। ऐसे में जेएमएम समाज को जातीय आधार पर बांटने के पक्ष में नहीं होगा। दूसरा खतरा यह भी है कि जातीय गणना होने पर जातीय संख्या सामने आने पर ओबीसी के भीतर भी कोटा देने की मांग तेज हो जाएगी। राज्य में पहले से ही सिर्फ 14 फीसदी आरक्षण लागू है। कुरमी, यादव और वैश्य जातियों के साथ-साथ मुसलिम समुदाय भी अधिक प्रतिनिधित्व की मांग उठा सकता है।
आप कांग्रेस के जनाधार को झारखंड में देखें तो यह जेएमएम के जैसा ही है। धर्मांतरित आदिवासी और मुसलमान इसके साथ हैं। ऐसे में इस जातीय सर्वे से कांग्रेस को कोई खास फायदा होता दिख नहीं रहा है। चूंकि राष्ट्रीय स्तर पर राहुल गांधी इस मुद्दे को उठाए हुए है तो राज्य में कांग्रेस की मजबूरी है कि वह भी इसे उठाए। अगर राज्य में यह सर्वे होता है तो यह सरदर्द ही साबित होगी। 3 प्वाइंट में जानिए सर्वे को लेकर जेएमएम उदासीन क्यों 3 प्वाइंट में समझिए कांग्रेस दबाव क्यों नहीं बना रही जातीय सर्वेक्षण की वस्तुस्थिति इस काम की वस्तुस्थिति ऐसी है कि बीते 3 मार्च को जातीय सर्वे के नोडल विभाग कार्मिक विभाग की बैठक हुई। जिसमें सर्वे की रूपरेखा, मैनपावर, बजट आदि को लेकर चर्चा हुई। कार्मिक विभाग के सूत्रों के मुताबिक इसके बाद से इस मुद्दे पर विभाग स्तर पर बड़े पैमाने पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। अगर प्रक्रिया की बात करें तो जिन सर्वे को लेकर बजट का प्रस्ताव तैयार होगा। वित्त विभाग से इसकी मंजूरी मिलेगी। इसके बाद ही सर्वे के काम को आगे बढ़ाया जा सकता है। जातीय सर्वे हुआ तो क्या असर पड़ेगा? एक्सपर्ट के मुताबिक झारखंड में कास्ट बेस्ड राजनीति से ज्यादा बाहरी-भीतरी की राजनीति चलती है। ऐसे में अगर जातीय सर्वे होता भी है तो इससे जातियों की स्थिति में कितना बदलाव होगा यह तो स्पष्ट नहीं दिखता है। पॉलिटिकल इंपैक्ट के तहत जेएमएम को नुकसान जरूर हो सकता है। एक्सपर्ट की मानें तो हमें यह भी देखना चाहिए कि जिन राज्यों में जातीय सर्वेक्षण हुआ है, वहां किस तरह के परिवर्तन हुए हैं।


