जन्म के आधे घंटे के भीतर मां का पहला गाढ़ा दूध बच्चे के लिए पीना आवश्यक होता है। एक उम्र तक मां का दूध बच्चों के विकास के लिए भी जरूरी होता है। लेकिन अलग-अलग वजहों से कई बार बच्चे को यह दूध नहीं मिल पाता है। झारखंड में इस कमी हो पूरा करने के लिए जल्द ही ह्यूमन मिल्क बैंक की शुरुआत होने जा रही है। रांची, बोकारो, दुमका और हजारीबाग में इसे प्रयोग के तौर पर खोला जाएगा। अगर इन जगहों पर यह प्रयोग सफल होता है तो फिर इसे राज्य के अलग-अलग हिस्से में बढ़ाया जाएगा। इस प्रोजेक्ट की शुरुआत करने के लिए झारखंड मेडिकल एंड हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एंड प्रोक्योरमेंट कॉरपोरेशन लिमिटेड की ओर से डोनर ह्यूमन मिल्क बैंक के लिए टेंडर जारी किया है। इसमें मिल्क बैंक के पूरे सेटअप, उपकरण इंस्टॉलेशन, सप्लाई कैलिब्रेशन और ट्रेनिंग शामिल हैं। टेंडर की प्रक्रिया 60 दिनों में पूरी करनी है। जबकि बिड सबमिशन 31 जनवरी से शुरू होगी और इसकी आखिरी तारीख 6 फरवरी 2025 है। जबकि इसका टेक्निकल बिड 7 फरवरी को खोला जाना है। नवजातों को मिले मां का दूध, यही उद्देश्य नवजात शिशुओं को अपनी मां के दूध के समान सुरक्षित दूध उपलब्ध कराना इस योजना का उद्देश्य है। इसके तहत मिल्क बैंक की स्थापना से लेकर दूध की जांच तथा मिल्क बैंक में काम करने वाले कर्मियों के प्रशिक्षण की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र को दी जाएगी। स्वास्थ्य विभाग के अनुमानित आंकड़े बताते हैं कि राज्य में लगभग 15 फीसदी बच्चे ऐसे होते हैं, जिन्हें मां का दूध नहीं मिल पाता है। राज्य में एनेमिया महिलाओं की ऐसी समस्या है, जिस वजह से उनका दूध नहीं बनता और नवजात उससे वंचित रह जाते हैं। ऐसे बच्चों को उनकी जरूरत को पूरा करने के लिए इसे शुरू करने का निर्णय लिया गया है। कैसे काम करेगा ह्यूमन मिल्क बैंक अब तक की जानकारी के अनुसार झारखंड के लिए यह नया प्रोजेक्ट है। जो भी कंपनी काम करेगी, उसे निर्धारित मापदंड को पूरा करना होगा। उसी तरीके से काम करना होगा। मदर मिल्क बैंक के लिए डोनर सिस्टम काम करता है। यहां महिलाएं अपनी स्वेच्छा से मिल्क डोनेट करेंगी। इसके बाद इसे प्रोसेस कर अस्पतालों को जरूरत के अनुसार उपलब्ध कराया जाएगा। इसलिए इस प्रोजेक्ट के डिटेल में मिल्क के बैंक के पूरे सेटअप, प्रॉपर ट्रेनिंग, इक्विपमेंट आदि की बात कही गई है। ब्रेस्टमिल्क न मिलना बच्चों के लिए जानलेवा यूनिसेफ समेत तमाम संस्थाओं की रिसर्च बताती हैं कि जिन बच्चों को मां का दूध पर्याप्त नहीं मिल पाता, वे ज्यादा बीमार पड़ते हैं। डायरिया और निमोनिया के साथ ही कई गंभीर रोगों की चपेट में आने का खतरा बढ़ जाता है। वे डायबिटीज, ल्यूकेमिया, फूड एलर्जी के शिकार हो सकते हैं। ऐसे बच्चे इन्फेक्शन का जल्दी शिकार होते हैं। वहीं, बच्चों को दूध न पिलाने वाली मांओं को ब्रेस्ट कैंसर, ओवरी कैंसर, मोटापा, डायबिटीज, ऑस्टियोपोरोसिस और दिल के रोगों का खतरा बढ़ जाता है। बिना जांच के दूसरी मां का दूध सेफ नहीं डॉ. रश्मि कहती हैं कि हमारी सोसायटी में एक परंपरा सी रही है कि जब किसी बच्चे को मां का दूध नहीं मिलता, तो कोई दूसरी परिचित महिला उसे अपना दूध पिला देती है। लेकिन, मेडिकल साइंस के मुताबिक ऐसा करना सेफ नहीं है। आमतौर पर डिलीवरी कराने वाले डॉक्टर को यह पता होता है कि कहीं मां बीमार तो नहीं है, वह बच्चे को स्तनपान करा सकती है या नहीं। अगर किसी खास वजह से डॉक्टर ने मना नहीं किया है, तो मां अपने बच्चे को दूध पिला सकती है। लेकिन, अगर कोई और महिला बच्चे को ब्रेस्टफीडिंग करा रही है, तो बिना जांच नहीं बताया जा सकता कि उसके दूध में कोई बैक्टीरिया तो नहीं है। ब्रेस्ट मिल्क बैंक में पूरी जांच के बाद ही किसी मां का दूध लिया जाता है, फिर उसे प्रोसेस करने के बाद बच्चे को दिया जाता है। जिससे किसी तरह के इन्फेक्शन की आशंका खत्म हो जाती है।


