आशीष बाजपेयी | बांसवाड़ा रिटायरमेंट का डेढ़ साल ही शेष है, यदि इस बीच ट्रेन चलाकर बांसवाड़ा पहुंचने का मौका मिला तो यह मेरे लिए जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी होगी। यह कहना है भारतीय रेलवे में लोको पायलट पद पर कार्यरत सुशील चंद्र व्यास का। वे बीते सोमवार को डूंगरपुर में पहली वंदे भारत ट्रेन लेकर पहुंचे थे। करीब एक साल से ज्यादा समय से वंदे भारत ट्रेन चलाने का अनुभव रखने वाले लोको पायलट व्यास का कहना था कि भले ही बांसवाड़ा ट्रेन लेकर नहीं पहुंच सका, लेकिन ननिहाल डूंगरपुर में पहली वंदे भारत लेकर पहुंचने की भी खुशी कम नहीं थी। जब ट्रेन लेकर डूंगरपुर पहुंचा तो आंखें नम हो गईं। ऐसा लगा मानो मुझे सब कुछ मिल गया। लोको पायलट व्यास मूलता बांसवाड़ा के त्रिपोलिया रोड के रहने वाले हैं, जो वर्तमान में उदयपुर में निवासरत हैं। यह ट्रेन सेमी हाई स्पीड ट्रेन है, इसकी खास बात है कि इसमें झटके नहीं लगते। यह सफर के लिहाज से से बेहद सुविधाजनक है। यह शुरुआत से ही स्पीड पकड़ती है, जो अलग ही अनुभव देती है। जब से उदयपुर से वंदे भारत ट्रेन शुरू हुई है, तब से यह ट्रेन चला रहा हूं। उस समय उद्घाटन वाली ट्रेन चलाने का अवसर तो नहीं मिला लेकिन सवारी वाली ट्रेन की शुरुआत में लोको पायलट मैं ही था। यह मौका मेरे लिए जीवन का सबसे यादगार पल बन गया। जब ट्रेन के भीतर से डूंगरपुर स्टेशन का बोर्ड देखा तो आंखें नम हो गईं। मैं करीब एक साल से ज्यादा समय से वंदे भारत ट्रेन चला रहा हूं, लेकिन जो खुशी उदयपुर-असारवा वंदे भारत ट्रेन को ले जाने में मिली, वह अलग ही एहसास था। क्योंकि पहली वंदे भारत ट्रेन लेकर वागड़ पहुंचना अलग ही अनुभव रहा। मैं वागड़ से हूं इसलिए खुशी ज्यादा है। शुरुआत से ही मैं सैनिक स्कूल या भारतीय रेलवे में नौकरी करने की ललक थी। बांसवाड़ा में आईटीआई करने के बाद रेलवे में परीक्षा दी और पहली बार में ही पास हो गया। नौकरी ज्वॉइन भी कर ली। हालांकि शुरुआती दौर में परिवार वालों की मंशा थी कि मैं शिक्षक बनूं। इसलिए बीएड भी किया, लेकिन शिक्षक बनने का मन नहीं था। मुझे रेलवे में 30 साल से ज्यादा समय हो चुका है। पूरे सर्विस काल में यही सपना रहा कि बांसवाड़ा ट्रेन लेकर जाऊं। लेकिन बांसवाड़ा में ट्रेन सेवा नहीं होने के कारण यह अवसर नहीं मिल सका। यदि ट्रेन सेवा बांसवाड़ा में होती और मैं ट्रेन लेकर पहुंचता तो मेरे लिए इससे बड़ी खुशी कुछ नहीं हो सकती। मैं इस अहसास को शब्दों में बयां ही नहीं कर सकता।


