जयपुर के जवाहर कला केंद्र में डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष ने कहा- पिछले दो शताब्दियों में हमारे जीवन के चिंतन में बड़ा बदलाव आया है। फोक शब्द की ट्रांसलेशन के साथ लोक शब्द आया है। जबकि लोक शब्द वह है, जो लोकतंत्र में है, लोकप्रिय में है। यही लोक शब्द के सही व व्यापक मायने हैं। संस्कार भारती जयपुर प्रांत, जवाहर कला केंद्र और पर्यटन-कला संस्कृति विभाग की सहभागिता में राजस्थान के लोक रंगों का उत्सव ‘लोक कला संगम 2026 राजस्थान रै लोकरंग रो उजास’ शुक्रवार से शुरू हुआ। इस कार्यक्रम में समारोह के पहले दिन लोक चौपाल के पहले सत्र में कृष्णायन सभागार में लोक जीवन की भारतीय अवधारणा विषय पर आयोजित किया गया। सत्र के प्रमुख वक्ता डॉ. इंदुशेखर तत्पुरुष, प्रो. तनुजा सिंह व डॉ. विवेक भटनागर रहे। डॉ. विवेक भटनागर ने कहा- लोक सूक्ष्म से स्थूल, अवचेतना से चेतना और जीवन से मरण की ओर जाने वाला शब्द है। यदि इतिहास की बात करें तो तकनीकी रूप से लोकस्वरूप में प्रचलित मान्यताएं ही लोक इतिहास है। वहीं डॉ. गीता तोमर ने कहा- लोकगीत व लोक संस्कृति निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। घर में शादी-विवाह हो तो लोकगीतों में महिलाओं के लिए माइक लगाने की जरूरत नहीं होती। वे अपना हृदय लगाकर लोकगीत गाती हैं। लोकगीत व लोक संस्कृति निरंतर चलने वाली प्रक्रिया
द्वितीय सत्र लोक दृष्टिः विचार, व्यवस्था और जीवन व्यवहार विषय पर आयोजित किया गया। सत्र में नारायण सिंह राठौड़, डॉ. गीता सामोर, तनेराज सिंह सोढ़ा ने विचार रखे। मंच संचालन डॉ. कपिल शर्मा ने किया। तनेराज सिंह सोढ़ा ने कहा- लोकदृष्टि हमें सबके लिए सोचने का अवसर प्रदान करती है। नई पीढ़ी प्रकृति से दूर होती जा रही है और बैडरूम कल्चर तक सिमटती जा रही है, यह सोचनीय विषय है। कार्यक्रम में जयपुर प्रांत अध्यक्ष प्रो. मधु भट्ट तैलंग ने स्वागत और आभार भाषण दिया। वहीं महामंत्री बनवारी लाल चेजारा ने आयोजन की प्रस्तावना रखी। इस मौके पर प्रो. तनुजा सिंह ने चित्रकला और लोक के संबंध पर कहा- लोक चेतना चित्रकला के व्यक्त होती है। लोक शब्द वह है, जहां से हम आते हैं, लोक चेतनाएं सीधी व सरल होती हैं, जो हम चित्रकला में महसूस करते हैं। तीन दिवसीय समारोह में मंच पर विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई। वहीं दूसरी ओर संध्या सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से सजी नजर आई। सत्र का संचालन डॉ. दीपक श्रीवास्तव ने किया। रंगारंग प्रस्तुतियों ने मोहा मन
समारोह में शाम को राजस्थान के विभिन्न अंचलों की 10 लोक विधाओं की प्रस्तुति शिल्पग्राम के मंच पर दी गई। बृज वंदना के साथ यह सांस्कृतिक यात्रा शुरू हुई। भजनों में गोमाता की महिमा का बखान हण्डू पहलवान व जगतसिंह ने किया। लांगुरिया कृष्णा गुर्जर एंड पार्टी ने, बम रसिया जगत सिंह सुंदरवाली पार्टी और भजन जिकड़ी तेज सिंह इसरोती एंड पार्टी ने प्रस्तुत किया। विष्णु एंड पार्टी ने मयूर नृत्य की प्रस्तुति ने सभी का मन मोहा। भपंग वादन की गफरुद्दीन मेवाती एंड पार्टी की ओर से दी गई प्रस्तुति पर सभी झूमने लगे। फूलों की होली व चरकुला नृत्य की प्रस्तुति में पं. विष्णु शर्मा एंड पार्टी ने बृज की संस्कृति से रूबरू करवाया। कल होंगे यह कार्यक्रम
गौरतलब है कि लोक कला संगम के दूसरे दिन शनिवार को लोक चौपाल में ‘राजस्थानी लोक: मन, मिट्टी और परंपरा का देशज संसार’ विषय पर पद्मश्री तिलक गिताई, अरुण प्रकाश व्यास, अंशु हर्ष विचार रखेंगे। वहीं ‘पर्यटन, पर्यावरण और लोक कला धरोहर से नवाचार तक’ विषय पर डॉ. अमिता राज गोयल, अशोक वर्मा चर्चा करेंगे। वहीं शाम को शिल्पग्राम में सांस्कृतिक प्रस्तुतियां होंगी, जिनमें जयपुर गालीबाजी, चार बेंच, कठपुतली, अलगोजा वादन, चरी नृत्य, कुचामणी ख्याल और तमाशा शामिल है।


