जोधपुर के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (कंज्यूमर कोर्ट) ने एक मामले में बीमा कंपनी की सारी दलीलें खारिज कर दीं और उपभोक्ता के हक में फैसला सुनाया। आयोग के अध्यक्ष राजकुमार सुथार और सदस्य दिलशाद अली की बेंच ने 18 फरवरी को दिए गए अपने आदेश में साफ-साफ कहा कि अगर पॉलिसी में ‘ओन डैमेज’ कवर शामिल है और इंजन डैमेज को स्पष्ट रूप से बाहर नहीं किया गया, तो कंपनी क्लेम देने से मना नहीं कर सकती। आयोग ने आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी को परिवादी को 2 लाख 26 हजार 80 रुपये हर्जाने सहित मानसिक पीड़ा और कानूनी व्यय के भुगतान के आदेश दिए हैं। दरअसल, भोपालगढ़ के रहने वाले रूपाराम ने 2019 में महिंद्रा मार्जो कार खरीदी थी, जिसका बीमा ICICI Lombard जनरल इंश्योरेंस से कराया गया। जुलाई 2021 में भारी बारिश के दौरान कार का इंजन क्षतिग्रस्त हो गया था। लेकिन बीमा कंपनी ने तकनीकी बहाने बनाकर क्लेम ठुकरा दिया। इस मामले में रूपाराम ने हार नहीं मानी और कंज्यूमर कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कंपनी का तर्क: इंजन डैमेज पॉलिसी की शर्तों में नहीं मामले की सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी के वकील ने जोर देकर कहा कि परिवादी की कार का इंजन पानी घुसने के कारण खराब हुआ था। कंपनी के अनुसार, वाहन की पॉलिसी सिर्फ ‘ओन डैमेज’ के लिए थी, और इंजन सेफ्टी के लिए स्पेशल ‘इंजन प्रोटेक्टर एड-ऑन’ नहीं लिया गया था। उनका तर्क था कि इंजन डैमेज ‘कॉन्सेक्वेंशियल लॉस’ है, जो स्टैंडर्ड पॉलिसी में कवर नहीं होता। लेकिन कोर्ट ने इन सबको सिरे से खारिज कर दिया आयोग का फैसला: “ओन डैमेज” का मतलब सभी डैमेज दस्तावेजों की बारीकी से जांच के बाद आयोग ने कहा कि ‘ओन डैमेज’ का मतलब वाहन को होने वाले हर तरह के नुकसान से है। अगर कोई खास डैमेज को ‘एक्सक्लूजन’ में नहीं लिखा गया, तो कंपनी उसे कवर करने से मुकर नहीं सकती। कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि प्रीमियम लेने के बाद कंपनी अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हट सकती। साथ ही, आयोग ने माना कि वैध क्लेम को तकनीकी आधार पर खारिज करना सेवा में गंभीर दोष का प्रमाण है। भुगतान और हर्जाने के निर्देश उपभोक्ता आयोग ने परिवादी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए बीमा कंपनी को भुगतान करने के अंतिम निर्देश जारी किए हैं। कोर्ट ने ICICI Lombard को रूपाराम को 2 लाख 26 हजार 80 रुपये का क्लेम अमाउंट, 5 हजार रुपए मानसिक पीड़ा के लिए और 6 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में देने का आदेश दिया। यह भुगतान फैसले के दो महीने में करना होगा, वरना 6% सालाना ब्याज भी चुकाना पड़ेगा।


