दमोह में होली पर्व पर शक्कर की चाशनी से विशेष मीठी मालाएं तैयार की जाती हैं। इन मालाओं को दो व्यक्तियों के बीच के पुराने बैर को समाप्त करने वाला माना जाता है। यह परंपरा केवल होली के अवसर पर ही निभाई जाती है। माला बनाने वाले रमेश नेमा ने बताया कि इसकी मुख्य विशेषता यह है कि इसे दो लोगों के बीच की कटुता को खत्म करने के लिए पहनाया जाता है। जब कोई व्यक्ति होली के दिन यह माला पहनाकर दूसरे को तिलक लगाता है, तो सामने वाला व्यक्ति मुस्कुराकर पुरानी दुश्मनी भुला देता है। यह अनूठी माला पूरे जिले में केवल एक ही परिवार द्वारा बनाई जाती है। नेमा परिवार पीढ़ियों से इस परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ निभाता आ रहा है। रमेश नेमा स्वयं इस कला को जारी रखने वाली तीसरी पीढ़ी हैं। माला बनाने की प्रक्रिया के बारे में रमेश नेमा ने बताया कि शक्कर की चाशनी को धागे के साथ सांचों में भरा जाता है। इसके बाद इन्हें सूखने के लिए रख दिया जाता है। चाशनी के सूख जाने पर सांचों को खोलकर मालाएं तैयार कर ली जाती हैं। एलएलबी पास फिर भी नहीं छोड़ी परंपरा
शक्कर की माला बनाने वाले स्टेशन चौराहा निवासी रमेश नेमा (71) ने बताया कि वे अपने दादा के समय से इस माला को परिवार में बनते देखते आ रहे हैं। नेमा बीएससी, एमए और एलएलबी हैं। घर पर पुस्तैनी काम बतेशा, मीठा व शक्कर की माला बनाने का होता ही था। इसलिए नौकरी या अन्य कोई कारोबार न कर उन्होंने अपने पुरखों की परंपरा को ही आगे निभाया। उनकी पत्नी गीता भी इस काम में उनका सहयोग करती हैं। उनके तीन बेटे हैं जो मप्र के बाहर हैं।


