दो डकैतों को मार गिराया, खून से लथपथ घर पहुंचे:इंदौर के एसीपी ने हाईकोर्ट में लड़ी लंबी लड़ाई, 21 साल बाद अब मिलेगा मेडल

जान पर खेलकर डकैतों से मुठभेड़ में बहादुरी दिखाने वाले पुलिस अफसर को राष्ट्रपति पुलिस वीरता पदक देने की अनुशंसा की गई। मध्यप्रदेश सरकार ने प्रस्ताव बनाकर केंद्र सरकार को भेजा लेकिन पदक पाने के लिए अफसर को लंबी अदालती लड़ाई लड़नी पड़ी। अदालत में तर्क-वितर्क चले। अब 5 दिन पहले हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने सरकार को निर्देश दिए हैं कि 1 महीने के भीतर पुलिस अफसर को पदक दिया जाए। इंदौर के एसीपी विवेक सिंह चौहान की 21 साल पहले 2003 में ग्वालियर में तैनाती के दौरान दो डकैतों से मुठभेड़ हुई थी। एक होमगार्ड के साथ उन्होंने न केवल डकैतों को खदेड़ा बल्कि दोनों को मार भी गिराया था। मुठभेड़ में होमगार्ड की मौत हो गई थी जबकि चौहान खून से लथपथ गंभीर हालत में घर पहुंचे थे। चौहान तब ग्वालियर पुलिस में एसआई हुआ करते थे। राज्य सरकार ने केंद्र से उन्हें राष्ट्रपति पुलिस वीरता पदक देने की अनुशंसा की थी। केंद्र ने कोई निर्णय नहीं लिया तो सिंह ने हाईकोर्ट का रुख किया। जहां एडवोकेट मृगेंद्र सिंह ने चौहान की तरफ से पैरवी की। मुठभेड़ की पूरी कहानी, एसीपी चौहान की जुबानी… दोनों ने राम-राम किया, फिर हम तीनों पर बंदूकें तान दीं
बात सोमवार 23 जून 2003 की है। मुखबिर ने सूचना दी कि ग्वालियर के घाटीगांव मेन रोड से 30 किलोमीटर अंदर घने जंगल में डांडाखिड़क हनुमान मंदिर के पास बकिला गुर्जर गैंग के डकैतों का मूवमेंट होता है। मैंने मौके पर जाकर रेकी करना तय किया। हमें वहां आने वाले डकैतों की संख्या के बारे में पता नहीं था। वे कब आते हैं, कहां से आते हैं, मंदिर में ही क्यों आते हैं? कुछ भी नहीं जानते थे। डकैतों को कैसे पकड़ा जाए इसलिए रेकी करना जरूरी था। अगले दिन मंगलवार 24 जून 2003 को मैं, होमगार्ड जवान सीताराम साहू (अब मृत) और मुखबिर एक ही गाड़ी से मौके पर पहुंचे। शाम के करीब 5 बजे थे। तब वहां कोई नहीं था। हनुमान जी के दर्शन किए और वहीं टहलकर रेकी करने लगे। करीब 6 बजे दो युवक बाइक से आए। उनके पास 12 बोर की बंदूकें थीं। राम-राम करने के बाद हनुमान जी के दर्शन किए। हमें यह नहीं पता था कि यही डकैत हैं। दर्शन करने के बाद उन्होंने हम तीनों पर बंदूकें तान दीं और बैठने को कहा। एक डकैत मेरे सामने बैठ गया। मुखबिर और होमगार्ड जवान के सामने दूसरा। मेरी जेब में टॉर्च थी। उन्हें बंदूक होने का शक हुआ, पूछा यह क्या है? मैंने निकालकर दिखा दिया कि टॉर्च है। इसके बाद उन्होंने सवाल-जवाब शुरू कर दिए। यहां क्यों आए, कहां रहते हो, इससे पहले कब आए थे? हम एक-एक करके जवाब दे रहे थे। इस बीच उन्होंने साफ कर दिया कि वे डकैत हैं। मैंने होमगार्ड से कहा- सीधा-साधा किसान हूं, कहां फंसा दिया
मैंने होमगार्ड जवान से कहा, ‘कहां फंसा दिया यार। मना किया था कि इतनी शाम को मंदिर में नहीं रुकेंगे। मैं सीधा-साधा किसान हूं। परिवार के लोग घर पर इंतजार कर रहे होंगे।’ यह कहते हुए मैं एक डकैत के पास पहुंच गया और उसकी बंदूक की नाल को ऊपर कर दिया। इतने में डकैत ने फायर किया तो यह मिस हो गया। मैंने उसकी बंदूक को पूरी ताकत से झटककर फेंक दिया। उसे पकड़ने से पहले अपनी सर्विस रिवॉल्वर निकालने लगा, जिसे मैंने कमर में छिपा रखा था। रिवॉल्वर अंदर खिसक गई। इसे पेंट के अंदर से बाहर निकाला लेकिन वह जमीन पर जा गिरी। तब तक डकैत से हाथापाई शुरू हो गई थी। उसने खुद को बचाने के लिए मेरे दोनों हाथ और कंधे पर दांतों से काट लिया। खून बहने लगा। उसकी बंदूक की नाल मेरी ठोड़ी पर लगी। इसका निशान आज भी है। मैंने पीछे से उसके दोनों हाथों को पकड़कर अपनी ओर खींच रखा था। मौका पाते ही मैं रिवॉल्वर के पास पहुंचा और उसे उठा लिया। डकैत पर फायर कर दिया। गोली उसके पेट में लगी। वह गिरा नहीं, मुझसे लड़ने के लिए फिर आगे बढ़ा। मैंने एक और फायर किया, गोली उसके पेट के दूसरे हिस्से में लगी। इतने में उसका साथी, जो मुखबिर और होमगार्ड जवान से भिड़ रहा था, मेरी ओर बढ़ा। मैंने उस पर भी फायर कर दिया। एक गोली उसके सीने और दूसरी पेट में लगी। वह लड़खड़ाते हुए वहीं पर गिर गया। कुछ ही देर में दोनों की मौत हो गई। पत्नी-भतीजे मुझे इस हालत में देखकर चौंक गए
अब तक अंधेरा हो चुका था। मुझे अफसरों को इस घटनाक्रम की जानकारी देनी थी। मैं मुखबिर की बाइक से जंगल से बाहर निकला और नेटवर्क एरिया में आकर एसपी को पूरी जानकारी दी। उन्होंने घाटीगांव और आसपास के थानों के बल को मेरे पास भेजा। एंबुलेंस से दोनों डकैतों के शव को ग्वालियर के अस्पताल पहुंचाया। यहां सुबह दोनों का पोस्टमार्टम कर शव उनके परिजन को सौंप दिए गए। जब मैं घर पहुंचा को पत्नी, भतीजे मुझे इस हालत में देखकर चौंक गए। मुझे अस्पताल पहुंचाया, जहां ट्रीटमेंट कराने के बाद हम घर लौटे। मर्डर, अपहरण और फिरौती मांगने के आरोपी थे डकैत
दोनों डकैतों की पहचान रामेश्वर पाठक (तब उम्र 50 साल) और शिवनारायण पाठक (तब उम्र 37 साल) के रूप में हुई। उन्होंने एक युवक का मर्डर किया था। निचली कोर्ट ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। दोनों ने इसके खिलाफ ग्वालियर हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने भी उनकी सजा को बरकरार रखा। कोर्ट का फैसला आते ही दोनों मौका पाकर पुलिस की गिरफ्त से भाग गए थे। फरारी के दौरान उन्होंने फिरौती और अपहरण करना शुरू कर दिया था। मुठभेड़ के कुछ दिन पहले ही दोनों ने 10 लाख रुपए लूटे थे। डकैत डांडाखिड़क हनुमान मंदिर में शरण लेते थे
डांडाखिड़क हनुमान मंदिर घाटीगांव के घने जंगलों में है। यहां आज भी चुनिंदा ग्रामीण ही पहुंचते हैं। एनकाउंटर के बाद मंदिर की तलाशी ली गई तो बड़ी मात्रा में किराना सामान मिला। कई दिन तक रुकने के पर्याप्त इंतजाम थे। पुलिस का मानना था कि डकैत किसी का अपहरण कर यहां आने वाले थे। इसके चलते ही उन्होंने सामान इकट्‌ठा किया था। अखबार की सुर्खियों में रहा था एनकाउंटर
चौहान ने बताया कि 2000 के दशक में ग्वालियर-चंबल अंचल में अपहरण और फिरौती की घटनाएं खूब हो रही थीं। इंजीनियर, सरकारी अधिकारियों और कई लोगों के अपहरण किए जा रहे थे। ये सभी फिरौती देकर छूट रहे थे। तिघरा से मोहना-घाटीगांव के बीच कुछ पंचायत गहरे जंगल में हैं। यह मुरैना से सटा इलाका है। पुलिस भी डकैतों तक नहीं पहुंच पा रही थी। ऐसे में दो डकैतों का एनकाउंटर उस समय अखबारों की सुर्खियां बना था। डकैतों के खिलीफ पुलिस का मनोबल भी बढ़ा था। ये खबर भी पढ़ें… एसआई बोले- लोगों ने हमारी वर्दी पकड़ी, गालियां दीं सीधी जिले में सोमवार शाम करीब 5:30 बजे बम्हनी चौकी प्रभारी डीडी सिंह समेत अन्य पुलिसकार्मियों के साथ महिलाओं और लोगों ने मारपीट कर दी। इसका वीडियो भी सामने आया है। गांव ही कुछ लोग सड़क पर व्यर्थ पानी बहने का विरोध कर रहे थे। ग्रामीणों ने अपने-अपने घरों के सामने पत्थर रख दिए थे। इससे आवाजाही बंद हो गई। मौके पर पुलिस पहुंची और रास्ता क्लियर कराने पत्थरों को हटाने लगी। ग्रामीणों ने इसका विरोध किया। पढ़ें पूरी खबर…

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