धमतरी के ऋतुराज पवार आय का एक-तिहाई दान दे रहे:एंबुलेंस सेवा शुरू कर मनाया मां का जन्मदिन, अब बनाने जा रहे वृद्धाश्रम

छत्तीसगढ़ के धमतरी के 41 साल के बिल्डर ऋतुराज पवार ने फ्री एंबुलेंस सेवा शुुरू कर अपनी मां का जन्मदिन मनाया। 7 साल से चल रही इस एंबुलेंस से अब तक 10 हजार से ज्यादा मरीजों को अस्पताल पहुंचाया गया है। अब वे करीब 40 लाख रुपए में एक वृद्धाश्रम बनाने जा रहे हैं, जिसमें रहने के लिए बुजुुर्गों से कोई किराया नहीं लिया जाएगा। इसे वे खुद ही चलाएंगे। वे अपनी कमाई का एक तिहाई हिस्सा बेटियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, विवाह पर खर्च कर रहे हैं। अब तक 50 से ज्यादा बेटियों को गृहस्थी का सामान दिला चुके हैं। ऋतुराज ने एक बॉडी फ्रीजर, एक व्हीलचेयर और 4 ऑक्सीजन मशीनें खरीदी हैं। एक ऑक्सीजन मशीन घर पर ही रखते हैं, ताकि जरूरत पड़ने पर किसी की मदद कर सकें। रितुराज ने बताया कि उन्हें समाज सेवा की प्रेरणा मां तरुणा पवार और पिता माधवराव पवार से मिली। वे बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ थीम पर लगभग 60 बेटियों की पढ़ाई में भी मदद कर रहे हैं। कई छात्राओं को साइकिल, लैपटॉप के अलावा कॉपी और किताबें दी गई हैं। मदद… रक्तदान ग्रुप ने दिखाई सेवा की राह ऋतुराज बताते हैं- लोगों की सेवा की शुरुआत करीब 7 साल पहले तब हुई, जब धमतरी में सक्रिय एक रक्तदान ग्रुप के सदस्यों ने मुझसे एंबुलेंस के लिए मदद मांगी। उनका एंबुलेंस पुराना हो गया था। इसके बाद ही मुझे लोगों की मदद करने का रास्ता मिल गया। लोगों की जरूरतें बहुत ज्यादा नहीं हैं, लेकिन अभाव की वजह से छोटी-छोटी जरूरतें बहुत बड़ी लगने लगती हैं। मैं बस उस अभाव को थोड़ा कम करना चाहता हूं। शांति भवन… जिन्हें अपनों ने ठुकराया, वे महिलाएं अपने पैरों पर खड़ा होना सीख रहीं शिवम विश्वकर्मा की रिपोर्ट छत्तीसगढ़ के रायपुर के शांति भवन में रहने वाली कल्पना पोलियोग्रस्त हैं। बचपन में माता-पिता गुजर गए। दो बड़ी बहनें थीं। एक दिन घुमाने के बहाने घर से दूर कहीं छोड़ गईं। वे कहती हैं- अब तो 15 साल बीत गए। पुलिस ने मुझे यहां पहुंचाया। अब मैंने सिलाई सीख ली है। अपने पैरों पर खड़ी हूं। मेरी जैसी कई लड़कियां यहां सक्षम बन रही हैं। होम की सुपीरियर सिस्टर सिसिल मैरी बताती हैं कि मदर टेरेसा ने इसे 1984 में शुरू कराया था। पहले यहां बच्चों को रखा जाता था। निसंतान दंपती यहां से बच्चे गोद लेते थे। बाद में नियमों में बदलाव करके असहाय और मानसिक रूप से कमजोर महिलाएं रखी जाने लगीं। आश्रम की सुपीरियर मैरी बताती हैं कि हर महीने करीब 3 लाख रुपए खर्च होते हैं। मिशन ऑफ चैरिटी, कोलकाता से 1.5-2 लाख रुपए मिलते हैं। बाकी का सारा इंतजाम आम लोग करते हैं।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *