भास्कर न्यूज | दंतेवाड़ा दक्षिण बस्तर में जहां होली अब डीजे और आधुनिक गीतों की धुन पर सिमटती जा रही है, वहीं नकुलनार गांव आज भी परंपरा की असली रंगत बचाए हुए है। यहां होली के पूरे 10 दिन पहले से गांव के शिव मंदिर में ब्रज और अवध की पारंपरिक फाग गूंजने लगती है। खास बात यह है कि इस फाग में एक नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियां एक साथ बैठती हैं बुजुर्ग, युवा और बच्चे। करीब 80 साल पुरानी इस परंपरा को जिंदा रखने के लिए गांव के लोग हर साल संगठित प्रयास करते हैं। होली के 10 दिन पहले से रोज शाम साढ़े 7 बजे शिव मंदिर में दो घंटे तक फाग गीतों का रिहर्सल होता है। जैसे परीक्षा से पहले छात्र तैयारी करते हैं, वैसे ही यहां फाग गाने की तैयारी की जाती है। दो टोलियां आमने-सामने बैठती हैं और फाग गीतों की प्रतिस्पर्धा होती है। एक टोली सवाल की तरह फाग गाती है तो दूसरी उसका जवाब सुर और ताल में देती है। गांव की दो पीढ़ियां युवा और बुजुर्ग ब्रज और अवध की फाग में पूरी तरह प्रशिक्षित हैं। तीसरी पीढ़ी यानी बच्चों को भी शुरुआत से इसमें शामिल किया जाता है, ताकि परंपरा आगे बढ़ती रहे। बुजुर्ग बच्चों को उच्चारण, लय और भाव समझाते हैं। यही कारण है कि नकुलनार में होली केवल त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रशिक्षण का पर्व बन चुकी है। होली के दिन सुबह 8 बजे शिव मंदिर से फाग की शुरुआत होती है। इसके बाद टोली गांव के 100 से अधिक घरों तक पहुंचती है। हर घर में एक-एक फाग गाई जाती है। शाम 6 बजे तक यह क्रम चलता है। गांव के हर घर में फाग टोली के स्वागत के लिए बैठने और स्वल्पाहार की व्यवस्था रहती है।
नकुलनार की होली की चर्चा दूर-दूर तक होती है, लेकिन यहां उत्सव अनुशासन के साथ मनाया जाता है। शराब पर पूरी तरह प्रतिबंध रहता है और हुड़दंग करने वालों पर सख्ती की जाती है।


