भीलवाड़ा | आधी फरवरी बीत गई। पहला पखवाड़ा गुजर गया। हफ्तेभर तक प्रेमसरोवर में आकण्ठ डूबे प्रेमी अब वास्तविक धरा पर लौटते हुए फिर से अपना ध्यान कॉपी- किताबों और काम धन्धे पर केन्द्रित करने लगे। यहां किसी के ह्दय में मीठी यादें थी तो किसी के पीठ पर लट्ठ के निशान। प्रेम से परिपूर्ण इन दिनों की युवा वर्षप्रर्यन्त प्रतिक्षा करते हैं। फरवरी के दूसरे हफ्ते चटकीले गुलाब, चॉकलेट्स और रूई के भालू यानी टेडी बियर, बाजार से निकल कर यथा स्थान पहुंच जाते हैं। उपहारों का ये आदान-प्रदान प्रेम के साथ साथ बाजार का भी उत्थान करता है। बाजार और बाग-बगीचों में चहल पहल बनी रहती है। प्रेम कभी बाजार नहीं रचता, पर बाजार को प्रेम रचना पड़ता है। बहरहाल यह उत्सव भी एक तरह से प्रेम का टी ट्वन्टी वर्ल्डकप है जो सप्ताहभर चलता है। इसके बाद बची आधी फरवरी तक थका हारा प्रेम हम जैसे पुराने लोगों के घर लौट आता है फिर सालभर यही प्रेम बगैर चॉकलेट, सिर्फ दाल रोटी पर जिंदा रहता है। प्रेम पर बहुत कुछ लिखा गया। गीत, गज़ल, कविताएं, निबन्ध, नॉवेल.. अनगिनत फिल्में भी बनी, स्कूल कॉलेज के अधपके आशिकों से लेकर परिपक्व शायरों और साधू- संतों तक सभी ने प्रेम को अपनी अपनी नजर से बयां किया पर यह फरवरी वाला प्रेम सबसे अलग है यहां का टेडीबीयर मखमली रूई का होने के बावजूद सब पर भारी पड़ता है। सोच रहा हूं शायर लोगों ने खामखां चांद को चुना, बाजार कभी चांद नहीं ला सकता सो चांद की जगह फिर टेडीबीयर सेट हुआ, यह सर्वत्र, सहज उपलब्ध है.. इसके आने के बाद प्रेम ने रफ्तार भी पकड़ी है। गली गली प्रेम बढ़ा.. ये अच्छा भी है, नफरतों के इस दौर में रूई का एक खिलौना दिलों को जोड़ता है तो इसमें बुरा भी क्या है। वैसे प्रेम किसी विशेष दिन या अवसर पर निर्भर नहीं करता। यह बहुत सहज सरल है, इसके कई रूप है। एक प्रेम ही है जो परिवार, मित्रो और रिश्तों को जोड़े रखता है। बस स्वार्थ से इसकी पटरी नहीं बैठती। इसके आते ही प्रेम खिसक लेता है। अभी कल ही भास्कर में रघुरामन जी ने लिखा है कि प्रेम का अर्थ सिर्फ साथ रहना भर नहीं है, कभी कभी इसे दोहराना भी जरूरी.. हम जानते है कि एक दिन यह सब खत्म हो जाना है.. बगैर यह पूछें कि मैं तैयार भी हूं या नहीं। और ये वाकई सच भी है फिर क्यों नहीं जीवन का हर पल प्रेम से भरा हो। हर छोटी छोटी बातें जो रिश्तों की कद्र और साथ गुजारी खट्टी मीठी यादों पर केन्द्रित होती होती है वो हमेशा आनन्द और शांति के भाव पर ले जाती है.. यही श प्रेम है।


