अंधविश्वास, महिला सम्मान, शिक्षा और कुरीतियों पर आधारित नाटक ‘स्वरूपा’ का भावपूर्ण मंचन किया गया। इसके जरिए लोगों को संदेश दिया कि अंधभक्त न बनें। अपनी बुद्धि और विवेक का इस्तेमाल कर घर की बेटियों को बुरे लोगों के हाथों में जाने से बचाएं। 40 मिनट के इस नाटक में 10 कलाकारों ने जीवंत प्रस्तुति दी। आटपाट नाट्य संस्था द्वारा पुरानी बस्ती स्थित जैतू साव मंदिर परिसर में इसका मंचन किया गया। नाटक के जरिए दिखाया गया कि मोहन अपनी पत्नी लक्ष्मी के साथ गांव में रहता है। वह अपनी बहन गौरी को बड़े ही लाड और दुलार से रखता है। उसे पढ़ने के लिए दूसरे गांव भेजता है। लौटने पर गौरी को पता चलता है कि महामाई देवी की पूजा के नाम पर गांव की बेटियों को मंदिर में सौंप दिया जाता है। यहां बाद में उन लड़कियों को देह व्यापार में ढकेल दिया जाता है। इसे रोकने गौरी प्रयास करती है, वह खुद भी मंदिर में सौंप दी जाती है और वहां पहुंचकर पूरे गांव वालों के सामने मंदिर के मुखिया को मार देती है और गांव वालों को अंधविश्वास से जागने के लिए प्रेरित करती है। दमदार डायलॉग्स पर बजती रहीं तालियां गौरी अपनी भाभी लक्ष्मी से कहती हैं कि अंध भक्त की एक सीमा होती है। ये विश्वास नहीं अंधविश्वास है। जहां बेटियों को देवी की सेवा के नाम पर सौंप दिया जाता है। और बाद में उन बेटियों को सेठ-साहूकार को बेच दिया जाता है। जब गौरी पूरे गांव वालों के सामने महामाई यानी मंदिर के मुखिया से कहती हैं बहुत शौक है ना सिंहासन में बैठने का अब मैं तुम्हें बैठाती हूं। अपने गांव में स्कूल खोलने के लिए गौरी कहती हैं ये गांव शिक्षा के अभाव में अंधविश्वास में डूब रहा है, यहां स्कूल खोलने की जरूरत है…। आ गई चटोरी बिल्लियां कटोरी लेकर…इन संवादों में तालियां बजी। नाटक का निर्देशन रोहित भूषणवार ने किया। जिसमें मोहन का कैरेक्टर नीरज वर्मा, गौरी-पूनम गडकरी, लक्ष्मी-तमन्ना गुप्ता, दुर्गा-अनिशा, वृंदा-सुब्रत शर्मा, महामाई-पिंकू वर्मा नजर आएं।


