करौली जिले में सपोटरा क्षेत्र की ग्राम पंचायत नारौली डांग में शनिवार को कोकला-कोकली चबूतरा निर्माण का भूमि पूजन किया गया।
यह आयोजन धार्मिक विधि-विधान और वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ संपन्न हुआ, जिसमें पंच पटेलों सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण मौजूद रहे। पं. राजेन्द्र शास्त्री ने विधिवत भूमि पूजन कराया। शिक्षाविद् और अध्यापक रामकिशन मीना ने बताया कि कोकला-कोकली की लोककथा लगभग 500 वर्ष पुरानी है। यह कथा आज भी इस क्षेत्र की सामाजिक परंपरा का हिस्सा है। लोकमान्यता के अनुसार, कोकला नामक एक वीर और उनकी पत्नी कोकली यहीं निवास करते थे। आज भी निभाई जा रही परंपरा
कथाओं के अनुसार, कोकला की शत्रुता के कारण एक भीषण युद्ध हुआ। इस युद्ध में शीश कटने के बाद भी कोकला का धड़ काफी दूर तक लड़ता रहा और अंततः एक स्थान पर गिरा। अपने पति के पीछे चल रही कोकली ने सती होने से पहले महिलाओं को आदेश (आंट) दिया कि उनके परिवार की आने वाली महिलाएं ससुराल का चूड़ा धारण नहीं करेंगी। यह परंपरा आज भी समाज में निभाई जा रही है। कोकला कुनबे के 150 परिवार
ग्रामीणों के अनुसार, दुबड़ी मोहल्ला, कोड़य्या और झोपड़ा मोहल्ला में कोकला कुनबे के लगभग 150 परिवार रहते हैं। इन परिवारों की महिलाएं प्रतिवर्ष बैशाख अमावस्या को 3 विशिष्ट स्थलों पर पूजा-अर्चना करती हैं। इनमें कोकला का सिर अध्यापक रामकिशन मीना के घर के पास, कोकला का धड़ बजरंगा नापित के घर के पास और कोकली माता का सती स्थल बावड़ी के समीप स्थित है। परंपरा को संरक्षित करना है उद्देश्य
इन स्थलों पर महिलाएं कोकला-कोकली की स्मृति, त्याग और परंपरा को नमन करती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चले आ रहे विश्वास, आस्था और सम्मान का प्रतीक है। इसी परंपरा को संरक्षित करने के उद्देश्य से इस चबूतरे का निर्माण किया जा रहा है।


