न्याय के लिए बेटे को रथ से कुचलवाया था:प्रहलाद बोले- आजादी के बाद तथाकथित धर्मनिपेक्षता के चलते अहिल्याबाई का इतिहास दबाया गया

प्रजा को न्याय का संदेश देने के लिए अपने बेटे को मौत की सजा सुनाने वाली अहिल्याबाई होल्कर को भारतीय जनता पार्टी याद कर रही है । गुरुवार को मुख्यमंत्री निवास में विशेष संगोष्ठी का आयोजन किया गया । मध्य प्रदेश के सीनियर बीजेपी नेता और पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल यहां मुख्य वक्ता के रुप में पहुंचे। उन्होंने कहा कि आजादी के बाद जो लोग सत्ता में आए उनकी वजह से तथाकथित धर्मनिरपेक्षता के चलते अहिल्याबाई होल्कर जैसी हस्तियों के इतिहास को दबाने का काम किया गया। पटेल ने आगे कहा- ऐसे लोगों के इतिहास के बारे में कभी हमने पलट कर चिंतन करने की कोशिश नहीं की। लेकिन हम गुलामी का इतिहास पढ़ते रहे। 17वीं शताब्दी मराठाओं, पेशवाओं और हिंदुओं की शताब्दी थी। अंग्रेजों के आगमन की शताब्दी थी, लेकिन हमने कभी इतिहास में इसका ताकत के साथ उल्लेख नहीं किया। जो लोग आजादी के बाद सत्ता में आए उन्होंेने कुछ खाने बनाए उसमें रानी दुर्गावती फिट नहीं बैठती, उन खानों में रानी लक्ष्मीबाई, रानी अवंती बाई फिट नहीं बैठती है।
अहिल्या बाई से जुड़ी कहानी सुनाई
अहिल्या बाई से जुड़ा एक किस्सा सुनाते हुए प्रहलाद बोले- एक बार जब अहिल्याबाई के बेटे मालेजी राव अपने रथ से सवार होकर राजबाड़ा के पास से गुजर रहे थे। उसी दौरान मार्ग के किनारे गाय का छोटा-सा बछड़ा भी खड़ा था। जैसे ही मालेजी राव का रथ वहां से गुजरा अचानक कूदता-फांदता बछड़ा रथ की चपेट में आ गया और उसकी मौत हो गई। गाय अपने बछड़े के शव के पास बैठी रही लोगों ने अहिल्याबाई को बताया कि राजकुमार के रथ से बछड़े को कुचल दिया। यह घटनाक्रम जानने के बाद अहिल्या ने दरबार में मालेजी की धर्मपत्नी मेनाबाई को बुलाकर पूछा कि यदि कोई व्यक्ति किसी की मां के सामने उसके बेटे का कत्ल कर दे तो, उसे क्या दंड देना चाहिए? मेनाबाई ने तुरंत जवाब दिया कि उसे मृत्युदंड देना चाहिए। इसके बाद अहिल्याबाई ने आदेश दिया कि उनके बेटे मालोजीराव के हाथ-पैर बांध दिए जाएं और उन्हें उसी प्रकार से रथ से कुचलकर मृत्यु दंड दिया जाए।
पति से वलूसी जीत की रकम- प्रहलाद ने बताया कि अहिल्या बाई को राज्य कि वित्तीय अधिकार थे, उनके पति शासन में बेहतर नहीं थे। एक युद्ध की जीत के बाद 9 लाख रुपए राजकोष में आए। मगर इसका हिसाब नहीं मिला। जब पूछा गया तो पता चला कि अहिल्याबाई के पति ने वो रकम रख ली है। तब अहिल्याबाई ने कहा यह नहीं हो सकता जीता हुआ धन राज्य का है किसी व्यक्ति के खर्चे में नहीं जा सकता। इतने में उनके पति ने कहा तुम मेरी पत्नी हो तुम ऐसे सवाल नहीं कर सकती हो। अहिल्याबाई ने कहा मैं राजधर्म के लिए नियुक्त हुई हूं और अपने 3 महीने का एडवांस ज्यादा ले लिया है। आपको आने वाले 5 महीने तक पैसे नहीं मिलेंगे और जो अधिक पैसे आपने लिए वो आपको जमा करना पड़ेगा। CM साय ने कहा
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने संगोष्ठी में राजमाता रानी अहिल्याबाई होल्कर के योगदानों को स्मरण करते हुए उन्हें भारत की सांस्कृतिक एकता और सुशासन का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि इंदौर की महारानी होने के बावजूद राजमाता ने स्वयं को किसी एक भौगोलिक सीमा में नहीं बांधा। उन्होंने देशभर में मंदिरों और धर्मशालाओं का निर्माण कराया। उन्होंने रामराज्य की अवधारणा को साकार करते हुए तीन दशकों तक होल्कर राजवंश का नेतृत्व किया। CM ने काशी विश्वनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण में रानी अहिल्याबाई होल्कर के योगदान को ऐतिहासिक बताया। पेशवा माधवराव की इच्छा के अनुरूप राजमाता ने इस मंदिर का पुनर्निर्माण कर करोड़ों आस्थावानों की भावना को सम्मान दिया। मध्यप्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने कहा कि रानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1767 से 1795 तक अपने 28 वर्षो के शासन काल में धर्मसत्ता और न्यायसत्ता की आवाज बुलंद की।
कौन थी अहिल्याबाई होल्कर
होलकर साम्राज्य की महारानी अहिल्याबाई ने 299 साल पहले ही कुरीतियों के बेड़ियों को तोड़ डाला था। संकट के समय जब जरूरत पड़ी तो अपनी प्रजा के लिए घोड़े पर सवार होकर हाथ में खड़ग लिए जंग भी लड़ी। धर्म का संदेश फैलाया, संस्कृति संरक्षण, बालिका शिक्षा, महिला अधिकारों और औद्योगीकरण को बढ़ावा दिया। इनका जन्म 31 मई, 1725 को हुआ था और 13 अगस्त, 1795 को निधन हो गया था। महाराष्ट्र में अहमदनगर जिले के जामखेड के नजदीक चोंडी गांव में जन्म लेने वाली अहिल्याबाई का शुरुआती जीवन बड़ी कठिनाईयों से गुजरा था। अहिल्याबाई होलकर के पिता मनकोजी सिंधिया बीड जिले के रहने वाले एक सम्मानित परिवार से संबंध रखते थे और गांव के पाटिल थे। अहिल्याबाई कभी स्कूल नहीं गईं थीं। उन्हें उनके पिता ने ही पढ़ना और लिखना सिखाया था। 1733 में यानी महज आठ साल की उम्र में ही उनका विवाह मल्हार राव खांडेकर के बेटे खांडेराव होलकर से कर दिया गया था। 21 साल की उम्र के उनके पति का निधन हुआ था अहिल्याबाई ने तब सती होने से इंकार कर दिया था। ससुर के निधन पर उन्होंने अपने बेटे को सिंहासन पर बैठाया। पति, ससुर और जवान बेटे को खाने के बाद अहिल्याबाई ने राजगद्दी संभाली थी।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *