बच्चों के खिलौनों को लेकर सुरक्षा और केमिकल्स की चर्चा हर कोई करता है, फिर भी बैट्रीवाले प्लास्टिक के खिलौने बढ़ते ही जा रहे हैं। लकड़ी के पारंपरिक खिलौनों में किसी की दिलचस्पी नहीं रह गई है। विडंबना और विरोधाभास देखिए- जिन खिलौनों में बैट्री, वायर, प्लास्टिक और कोई जोखिम नहीं, वही डिमांड से बाहर हैं। अडूसा, आम और चमेली जैसी नरम लकड़ी से खिलौने बनते हैं, हल्के होते है, आसान होते हैं और बच्चों के लिए सुरक्षित होते हैं। आज खिलौनों की पसंद सुरक्षा से नहीं, बल्कि मोशन और शोर से तय होती है। कारीगर कहते हैं- मेहनत ज्यादा, कमाई कम और भविष्य शून्य है… लकड़ी के खिलौने बनाना बोझ बन रहा है 40 वर्षीय बबलू सुथार बताते हैं- मेरा परिवार लकड़ी के खिलौनों के लिए जाना जाता है। दादा और पिता पूरा जीवन खिलौने बनाए। पिता के दौर में लकड़ी के खिलौनों से कमाई भी अच्छी थी और सम्मान भी…तो उन्होंने सरकारी नौकरी लेने से मना कर दिया था। अब हालात बदल चुके हैं। आज लकड़ी का 100 रुपए का खिलौना भी कोई नहीं लेता। सस्ते इलेक्ट्रॉनिक या प्लास्टिक खिलौने चल पड़े हैं। मेरा परिवार तोरण, गणगौर बनाकर पेशा बचा रहा है, पेट पाल रहा है। बबलू यह भी कहते हैं- सरकार हमें मौके देती है, लेकिन ग्राहक नहीं खरीदेंगे तो सरकार भी क्या करे। स्कूलों में हस्तशिल्प आधारित खिलौनों को सीखने और समझने का माध्यम माना जाता था। आज स्कूल प्रोजेक्ट्स में भी रेडीमेड प्लास्टिक मॉडल इस्तेमाल हो रहे हैं। लकड़ी के खिलौने न तो पढ़ाई का हिस्सा बचे हैं ना ही खेल का। बबलू के बड़े भाई वेदप्रकाश बताते हैं- भारत में खिलौनों के लिए बीआईएस जैसे मानक हैं। पारंपरिक कारीगर इन मानकों, लाइसेंस और टेस्टिंग की प्रक्रिया तक पहुंच ही नहीं पाते। न उनके पास जानकारी है ना संसाधन। जो खिलौने सबसे सुरक्षित हैं, वही असंगठित कहकर बाहर कर दिए जाते हैं। हमने कई बार कोशिश कि सोसायटी बनाकर अपनी बात लोगों तक पहुचाएं, लेकिन ग्राहक नहीं आते। कारीगर कहते हैं- मेहनत और कमाई के लिहाज से यह काम बोझ बन गया है। अगर आप ऐसी किसी कला से जुड़े हैं जो अब अपने आखिरी दौर में है तो व्हाट्सएप नंबर पर 9340931502 पर मैसेज करें। हम आपको कॉल करेंगे।


