पढ़ाई में होशियार, लेकिन किसी से बात नहीं करता बच्चा

दबाव कम करें अंक ही सब कुछ नहीं : विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार बच्चे पर अनजाने में परफॉर्म करने का दबाव बना दिया जाता है। माता-पिता और शिक्षक बार-बार अच्छे नंबरों की चर्चा करते हैं, जिससे बच्चा यह मान लेता है कि उसकी पहचान सिर्फ पढ़ाई से है। ऐसे में वह अपनी भावनाएं दबाने लगता है। जरूरी है कि माता-पिता बच्चे की तारीफ सिर्फ अंकों के लिए नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, प्रयास और ईमानदारी के लिए भी करें। रोज की छोटी बातचीत असरदार : मनोवैज्ञानिक सलाह देते हैं कि रोज कम से कम कुछ समय ऐसा तय करें जब पूरा परिवार साथ बैठे और सामान्य बातें करे। इस दौरान पढ़ाई या परिणाम की चर्चा न हो। बच्चे से उसके दिन के अनुभव पूछें, लेकिन सवाल-जवाब की तरह नहीं, दोस्ताना अंदाज में। अगर बच्चा तुरंत जवाब न दे तो उसे समय दें। लगातार स्नेहपूर्ण व्यवहार से वह धीरे-धीरे खुलने लगता है। वास्तविक रिश्तों को बढ़ावा दें : कई मामलों में पाया गया है कि बच्चा मोबाइल या लैपटॉप में ज्यादा समय बिताता है और वास्तविक बातचीत से बचता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि घर में ‘नो स्क्रीन टाइम’ का एक निश्चित समय तय किया जाए, जब सभी सदस्य आमने-सामने बैठकर बातचीत करें या कोई गतिविधि साथ करें, जैसे बोर्ड गेम, कुकिंग या टहलना। स्कूल से संपर्क रखें : अगर बच्चा स्कूल में भी चुप रहता है तो क्लास टीचर या काउंसलर से बात करना जरूरी है। कई स्कूलों में अब नियमित काउंसलिंग सत्र होते हैं। शिक्षक बच्चे के व्यवहार के बारे में बेहतर फीडबैक दे सकते हैं। कुछ मामलों में ग्रुप एक्टिविटी, डिबेट या ड्रामा जैसी गतिविधियां बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ाने में मदद करती हैं। जरूरत पड़े तो विशेषज्ञ की मदद लें : यदि बच्चा लंबे समय तक अलग-थलग रहे, आंख मिलाकर बात न करे, या उदासी और चिड़चिड़ापन दिखाए, तो बाल मनोवैज्ञानिक से परामर्श लेना फायदेमंद हो सकता है। विशेषज्ञ थेरेपी या काउंसलिंग के माध्यम से बच्चे को अपनी भावनाएं व्यक्त करना सिखाते हैं। समय पर की गई पहल भविष्य में बड़ी समस्या बनने से रोक सकती है। भास्कर न्यूज | लुधियाना शहर में ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं जहां बच्चे पढ़ाई में बेहद होशियार हैं, क्लास में अच्छे अंक लाते हैं, लेकिन घर और स्कूल में किसी से खुलकर बात नहीं करते। माता-पिता इसे अक्सर शांत स्वभाव समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि यह व्यवहार अंदरूनी दबाव, आत्मविश्वास की कमी या भावनात्मक उलझन का संकेत भी हो सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि समय रहते सही कदम उठाए जाएं तो बच्चे को सहज और आत्मविश्वासी बनाया जा सकता है। मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि हर बच्चा अलग होता है। कुछ कम बोलते हैं, कुछ ज्यादा। जरूरी यह है कि माता-पिता बच्चे की चुप्पी के पीछे छिपे कारण को समझें, उसे स्वीकारें और धैर्य के साथ उसका साथ दें। सही मार्गदर्शन, खुला संवाद और बिना शर्त प्यार ही ऐसे बच्चों को आत्मविश्वासी और संतुलित व्यक्तित्व की ओर ले जा सकता है। बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार कई बच्चे स्वभाव से अंतर्मुखी होते हैं, लेकिन जब बच्चा परिवार के सदस्यों से भी दूरी बनाने लगे, दोस्तों से घुलना-मिलना बंद कर दे या अपनी भावनाएं साझा न करे, तो इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है। कुछ मामलों में देखा गया है कि बच्चा पढ़ाई को ही अपनी पहचान बना लेता है और सामाजिक बातचीत से बचता है। इससे आगे चलकर टीमवर्क, प्रेजेंटेशन या इंटरव्यू जैसी स्थितियों में उसे दिक्कत आ सकती है।

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